UPESSC पीजीटी समाजशास्त्र – अध्ययन सामग्री
भाग 1: इकाई 1–8 (आधार, विचारक, सिद्धांत, संस्थाएँ)
भाषा: हिन्दी · हाइलाइट किए गए तथ्य परीक्षा में बार-बार पूछे जाते हैं।
इकाई 1 – समाजशास्त्र का अर्थ, उत्पत्ति और विषय-क्षेत्र
1.1 अर्थ और उत्पत्ति
- Sociology शब्द लैटिन के सोशियस (Socius) – साथी, सहचर – और यूनानी के लोगोस (Logos) – अध्ययन, विज्ञान – से बना है। शाब्दिक अर्थ है "समाज का विज्ञान"।
- "समाजशास्त्र" शब्द ऑगस्ट कॉम्ट ने 1838 में गढ़ा, अपनी पुस्तक कूर्स द फ़िलॉसफ़ी पॉज़िटिव के चौथे खंड में। पहले उन्होंने इसे "सामाजिक भौतिकी" (Social Physics) कहा था।
- कॉम्ट को "समाजशास्त्र का जनक" कहा जाता है। दुर्खीम को अक्सर शैक्षणिक/वैज्ञानिक समाजशास्त्र का संस्थापक कहा जाता है।
- 19वीं शताब्दी के यूरोप में समाजशास्त्र का उदय फ्रांसीसी क्रांति (1789), औद्योगिक क्रांति, ज्ञानोदय (प्रबोधन), नगरीकरण और वैज्ञानिक पद्धति के विकास के कारण हुआ।
1.2 प्रमुख परिभाषाएँ
| विचारक | परिभाषा |
| मैक्स वेबर | "समाजशास्त्र वह विज्ञान है जो सामाजिक क्रिया का व्याख्यात्मक बोध करने का प्रयास करता है, ताकि उसकी गति और परिणामों की कार्य-कारण व्याख्या की जा सके।" |
| एमिल दुर्खीम | समाजशास्त्र सामाजिक संस्थाओं का विज्ञान है; इसकी विषय-वस्तु सामाजिक तथ्य हैं। |
| मैकाइवर एवं पेज | "समाजशास्त्र सामाजिक संबंधों के विषय में है, संबंधों के उस जाल को हम समाज कहते हैं।" |
| मॉरिस गिंसबर्ग | "समाजशास्त्र मानवीय अंतःक्रियाओं और अंतःसंबंधों, उनकी दशाओं और परिणामों का अध्ययन है।" |
| जॉर्ज सिमेल | समाजशास्त्र सामाजिक अंतःक्रिया के स्वरूपों का अध्ययन करता है। |
| एफ.एच. गिडिंग्स | "समाजशास्त्र समाज का वैज्ञानिक अध्ययन है।" |
| लेस्टर एफ. वार्ड | "समाजशास्त्र समाज या सामाजिक घटनाओं का विज्ञान है।" |
| किंग्सले डेविस | "समाजशास्त्र समाज का एक सामान्य विज्ञान है।" |
1.3 विषय-क्षेत्र – दो सम्प्रदाय
| स्वरूपात्मक / विशिष्टवादी सम्प्रदाय | समन्वयात्मक सम्प्रदाय |
समाजशास्त्र को केवल सामाजिक संबंधों के स्वरूपों का अध्ययन करना चाहिए, ताकि यह एक अलग, विशिष्ट विज्ञान बना रहे। विचारक: जॉर्ज सिमेल, वीरकांत, लियोपोल्ड वॉन वीज़, फर्डिनेंड टॉनीज़, मैक्स वेबर, स्मॉल। | समाजशास्त्र एक सामान्य विज्ञान होना चाहिए जो सभी सामाजिक विज्ञानों का समन्वय करे और पूरे समाज का अध्ययन करे। विचारक: एमिल दुर्खीम, एल.टी. हॉबहाउस, पी.ए. सोरोकिन, मॉरिस गिंसबर्ग। |
| आलोचना: स्वरूप को विषय-वस्तु से अलग नहीं किया जा सकता। | दुर्खीम ने समाजशास्त्र को तीन भागों में बाँटा: सामाजिक आकारिकी, सामाजिक शरीरक्रियाशास्त्र और सामान्य समाजशास्त्र। |
1.4 समाजशास्त्र की प्रकृति (रॉबर्ट बीरस्टीड, द सोशल ऑर्डर)
- यह सामाजिक विज्ञान है, प्राकृतिक नहीं
- यह निरपेक्ष/वास्तविक (Categorical) विज्ञान है, आदर्शात्मक (Normative) नहीं। यह "क्या है" का अध्ययन करता है, "क्या होना चाहिए" का नहीं।
- यह विशुद्ध विज्ञान है, व्यावहारिक नहीं
- यह अमूर्त विज्ञान है, मूर्त नहीं
- यह सामान्यीकरण करने वाला विज्ञान है, विशेष घटनाओं का नहीं
- यह तार्किक और आनुभविक दोनों प्रकार का विज्ञान है
- यह सामान्य विज्ञान है, विशेष नहीं
1.5 अन्य सामाजिक विज्ञानों से संबंध
| विज्ञान | मुख्य बिंदु |
| मानवशास्त्र | क्रोबर ने समाजशास्त्र और मानवशास्त्र को "जुड़वाँ बहनें" कहा। मानवशास्त्र सरल/जनजातीय समाजों का अध्ययन करता है; समाजशास्त्र मुख्यतः जटिल/आधुनिक समाजों का। |
| इतिहास | "इतिहास भूतकालीन समाजशास्त्र है और समाजशास्त्र वर्तमान इतिहास है" (जी.ई. हावर्ड)। इतिहास विशेष घटनाओं का अध्ययन करता है, समाजशास्त्र सामान्यीकरण करता है। |
| मनोविज्ञान | मनोविज्ञान व्यक्ति के मन का अध्ययन करता है, समाजशास्त्र समूहों का। सामाजिक मनोविज्ञान दोनों के बीच का सेतु है। |
| अर्थशास्त्र | अर्थशास्त्र धन, उत्पादन और उपभोग से जुड़ा है। वेबर (प्रोटेस्टेंट नीति) और मार्क्स ने अर्थव्यवस्था को समाज से जोड़ा। |
| राजनीति विज्ञान | राजनीति विज्ञान राज्य और सरकार का अध्ययन करता है; राजनीतिक समाजशास्त्र समाज में शक्ति का। |
1.6 भारत में समाजशास्त्र का विकास
- 1919: भारत का पहला समाजशास्त्र विभाग बम्बई विश्वविद्यालय में स्थापित हुआ, जिसके अध्यक्ष पैट्रिक गेडिस थे। जी.एस. घुरिये 1924 में आए और 1959 तक विभागाध्यक्ष रहे।
- 1917: कलकत्ता विश्वविद्यालय में समाजशास्त्र का अध्यापन शुरू हुआ (ब्रजेन्द्रनाथ सील)।
- 1921: लखनऊ विश्वविद्यालय (राधाकमल मुकर्जी ने डी.पी. मुकर्जी और डी.एन. मजूमदार के साथ "लखनऊ सम्प्रदाय" बनाया)।
- 1951: जी.एस. घुरिये ने भारतीय समाजशास्त्रीय परिषद (Indian Sociological Society) की स्थापना की; इसकी पत्रिका सोशियोलॉजिकल बुलेटिन 1952 में शुरू हुई।
- विश्व: पहला समाजशास्त्र विभाग शिकागो विश्वविद्यालय में 1892 में बना (एल्बियन स्मॉल)। पहली पत्रिका अमेरिकन जर्नल ऑफ़ सोशियोलॉजी 1895 में निकली। दुर्खीम ने 1898 में ल'आनी सोशियोलॉजिक शुरू की।
- "भारतीय समाजशास्त्र के जनक": जी.एस. घुरिये। "भारतीय मानवशास्त्र के जनक": शरतचन्द्र रॉय।
1.7 प्रत्यक्षवाद बनाम प्रत्यक्षवाद-विरोध
| प्रत्यक्षवाद (Positivism) | प्रत्यक्षवाद-विरोध (व्याख्यात्मक उपागम) |
| प्राकृतिक विज्ञानों की पद्धति अपनाता है; अवलोकन योग्य तथ्यों का अध्ययन करता है; नियमों की खोज करता है। कॉम्ट, दुर्खीम। | अर्थ और उद्देश्यों का अध्ययन करता है; बोध (Verstehen) पद्धति अपनाता है। वेबर, डिल्थे, रिकर्ट, शुट्ज़। |
इकाई 2 – पाश्चात्य समाजशास्त्रीय विचारक
2.1 ऑगस्ट कॉम्ट (1798–1857), फ्रांस
- वे सेंट-साइमन के सचिव थे और उनसे प्रभावित थे।
- प्रमुख पुस्तकें: प्रत्यक्षवादी दर्शन (कूर्स द फ़िलॉसफ़ी पॉज़िटिव, 6 खंड, 1830–1842); प्रत्यक्षवादी राजनीति की व्यवस्था (सिस्टम ऑफ़ पॉज़िटिव पॉलिटी, 1851–1854)।
- तीन अवस्थाओं का नियम (मानव मस्तिष्क और समाज का विकास):
- धार्मिक / काल्पनिक अवस्था: घटनाओं की व्याख्या अलौकिक शक्तियों से होती है। उप-अवस्थाएँ: वस्तु-पूजा (फ़ेटिशवाद) → बहुदेववाद → एकेश्वरवाद। समाज पर पुरोहितों और सेना का शासन होता है।
- तात्विक / अमूर्त अवस्था: घटनाओं की व्याख्या "प्रकृति" जैसी अमूर्त शक्तियों से होती है। वकील और दार्शनिक प्रभावी होते हैं।
- प्रत्यक्ष / वैज्ञानिक अवस्था: घटनाओं की व्याख्या अवलोकन और वैज्ञानिक नियमों से होती है। वैज्ञानिक और उद्योगपति नेतृत्व करते हैं।
- विज्ञानों का संस्तरण (सामान्य और सरल से जटिल की ओर): गणित → खगोलशास्त्र → भौतिकी → रसायनशास्त्र → जीवविज्ञान → समाजशास्त्र। समाजशास्त्र "विज्ञानों की रानी" है।
- सामाजिक स्थैतिकी (व्यवस्था, स्थिरता, संरचना) और सामाजिक गतिकी (प्रगति, परिवर्तन)।
- पद्धतियाँ: अवलोकन, परीक्षण, तुलना और ऐतिहासिक पद्धति।
- मानवता का धर्म: जीवन के अंतिम चरण में उन्होंने एक "प्रत्यक्षवादी धर्म" का प्रस्ताव रखा, जिसमें मानवता ही "महान सत्ता" है।
2.2 हरबर्ट स्पेंसर (1820–1903), इंग्लैंड
- प्रमुख पुस्तकें: सोशल स्टैटिक्स (1851), फ़र्स्ट प्रिंसिपल्स (1862), प्रिंसिपल्स ऑफ़ बायोलॉजी (1864), द स्टडी ऑफ़ सोशियोलॉजी (1873), प्रिंसिपल्स ऑफ़ सोशियोलॉजी (3 खंड, 1876–1896), द मैन वर्सेस द स्टेट (1884)।
- "योग्यतम की उत्तरजीविता" (Survival of the fittest) वाक्यांश स्पेंसर ने 1864 में गढ़ा, डार्विन ने नहीं। स्पेंसर सामाजिक डार्विनवाद के जनक हैं।
- सावयवी सादृश्य (Organic Analogy): समाज एक जीवित शरीर जैसा है। दोनों बढ़ते हैं, जटिल और विभेदीकृत होते हैं, और दोनों के अंग अन्योन्याश्रित हैं। अंतर: समाज में एक केंद्रीय चेतना नहीं होती, और उसके अंग (व्यक्ति) स्वतंत्र होते हैं।
- सामाजिक उद्विकास का सिद्धांत: उद्विकास सरल से मिश्रित, समरूपता से विषमरूपता, अनिश्चित से निश्चित और असंबद्धता से संबद्धता की ओर होता है। संरचना के आधार पर समाज के प्रकार: सरल, मिश्रित, दोहरे मिश्रित, तिहरे मिश्रित।
- सैनिक बनाम औद्योगिक समाज: सैनिक समाज अनिवार्य सहयोग और केंद्रीकृत नियंत्रण पर आधारित होते हैं; औद्योगिक समाज स्वैच्छिक सहयोग और व्यक्तिगत स्वतंत्रता पर।
- अधिसावयवी उद्विकास: सावयवी स्तर से ऊपर समाज और संस्कृति का उद्विकास।
- उन्होंने अहस्तक्षेप (laissez-faire) नीति का समर्थन किया, यानी राज्य का न्यूनतम हस्तक्षेप।
2.3 कार्ल मार्क्स (1818–1883), जर्मनी
- प्रमुख पुस्तकें: आर्थिक और दार्शनिक पाण्डुलिपियाँ (1844), द जर्मन आइडियोलॉजी (1845–46, एंगेल्स के साथ), दर्शन की दरिद्रता (1847), कम्युनिस्ट घोषणापत्र (1848, फ्रेडरिक एंगेल्स के साथ), लुई बोनापार्ट का अठारहवाँ ब्रूमेर (1852), राजनीतिक अर्थशास्त्र की समालोचना में योगदान (1859), दास कैपिटल खंड 1 (1867)।
- ऐतिहासिक भौतिकवाद / आर्थिक निर्धारणवाद: आर्थिक आधार (उत्पादन की प्रणाली) समाज के बाकी हिस्सों को निर्धारित करता है।
- आधार (अवसंरचना): उत्पादन की शक्तियाँ (औज़ार, तकनीक, श्रम) + उत्पादन के संबंध (स्वामित्व)।
- अधिसंरचना: कानून, राजनीति, धर्म, परिवार, शिक्षा, विचारधारा।
- द्वंद्वात्मक भौतिकवाद: उन्होंने हीगल की द्वंद्वात्मक पद्धति (वाद–प्रतिवाद–संवाद) ली और उसे भौतिक परिस्थितियों पर लागू किया। मार्क्स ने कहा कि उन्होंने हीगल को "सिर के बल से पैरों पर खड़ा" कर दिया।
- इतिहास की अवस्थाएँ: आदिम साम्यवाद → प्राचीन (दास) → सामंतवाद → पूँजीवाद → समाजवाद → साम्यवाद। उन्होंने "एशियाई उत्पादन प्रणाली" का भी वर्णन किया।
- वर्ग संघर्ष: "अब तक के सभी समाजों का इतिहास वर्ग संघर्षों का इतिहास है।" (कम्युनिस्ट घोषणापत्र)। पूँजीवाद में: बुर्जुआ (पूँजीपति, मालिक) बनाम सर्वहारा (मज़दूर)। लम्पेन सर्वहारा = सबसे निचला, असंगठित वर्ग।
- स्वयं में वर्ग (वस्तुगत वर्ग स्थिति) → स्वयं के लिए वर्ग (वर्ग चेतना)। मिथ्या चेतना का अर्थ है मज़दूरों द्वारा शासक वर्ग की विचारधारा को स्वीकार कर लेना।
- अलगाव (Alienation) (1844 की पाण्डुलिपियाँ), चार प्रकार: उत्पाद से, उत्पादन की प्रक्रिया से, प्रजाति-सत्ता (मानव स्वभाव) से, और अन्य मनुष्यों से।
- अतिरिक्त मूल्य (Surplus Value): श्रम द्वारा पैदा किए गए मूल्य और दी गई मज़दूरी का अंतर। यही लाभ और शोषण का स्रोत है।
- "धर्म जनता की अफ़ीम है" (हीगल के अधिकार दर्शन की समालोचना, 1843–44 से)।
- "दुनिया के मज़दूरो, एक हो! तुम्हारे पास खोने के लिए अपनी ज़ंजीरों के सिवा कुछ नहीं है।"
2.4 एमिल दुर्खीम (1858–1917), फ्रांस
- उन्होंने 1887 से बोर्डो में सामाजिक विज्ञान पढ़ाया, 1902 में सोरबोन (पेरिस) गए, और 1898 में ल'आनी सोशियोलॉजिक पत्रिका शुरू की।
- प्रमुख पुस्तकें (क्रम याद रखें):
| वर्ष | पुस्तक | मुख्य विचार |
| 1893 | समाज में श्रम विभाजन (The Division of Labour in Society) | यांत्रिक और सावयवी एकता; दमनकारी और प्रतिकारी कानून; सामूहिक चेतना |
| 1895 | समाजशास्त्रीय पद्धति के नियम (The Rules of Sociological Method) | सामाजिक तथ्य; सामान्य बनाम व्याधिकीय; "सामाजिक तथ्यों को वस्तु मानो" |
| 1897 | आत्महत्या (Suicide) | आत्महत्या के चार प्रकार; एकीकरण और नियमन |
| 1912 | धार्मिक जीवन के प्रारंभिक स्वरूप (The Elementary Forms of Religious Life) | पवित्र और अपवित्र (लौकिक); टोटमवाद (ऑस्ट्रेलिया की अरुण्टा जनजाति); सामूहिक उत्तेजना |
- सामाजिक तथ्य: "कार्य करने, सोचने और अनुभव करने के वे तरीके, जो व्यक्ति से बाहर होते हैं और जिनमें बाध्य करने की शक्ति होती है"। दो विशेषताएँ: बाह्यता और बाध्यता। "सामाजिक तथ्यों को वस्तुओं के रूप में देखो।"
- एकता (Solidarity):
| यांत्रिक एकता | सावयवी एकता |
| सरल, परंपरागत समाज | आधुनिक, औद्योगिक समाज |
| समानता (एकरूपता) पर आधारित | भिन्नता और अन्योन्याश्रितता (श्रम विभाजन) पर आधारित |
| प्रबल सामूहिक चेतना | दुर्बल सामूहिक चेतना, अधिक व्यक्तिवाद |
| दमनकारी (दंडात्मक) कानून | प्रतिकारी (क्षतिपूरक/दीवानी) कानून |
- आत्महत्या – चार प्रकार:
| प्रकार | कारण | उदाहरण |
| अहंवादी (Egoistic) | बहुत कम एकीकरण | अविवाहित लोग, प्रोटेस्टेंट (कैथोलिकों से अधिक) |
| परार्थवादी (Altruistic) | बहुत अधिक एकीकरण | सैनिक, सती प्रथा, जापानी हाराकीरी |
| आदर्शशून्य / प्रतिमानहीन (Anomic) | बहुत कम नियमन (मानदंडहीनता, अचानक परिवर्तन) | आर्थिक तेज़ी या मंदी, अचानक तलाक |
| भाग्यवादी (Fatalistic) | बहुत अधिक नियमन | दास, कैदी (केवल एक पाद-टिप्पणी में चर्चा) |
- आदर्शशून्यता (Anomie): मानदंडहीनता की स्थिति। यह श्रम विभाजन और आत्महत्या दोनों में आती है।
- धर्म (परिभाषा): "पवित्र वस्तुओं से संबंधित विश्वासों और आचरणों की एक संगठित व्यवस्था... जो उन्हें मानने वाले सभी लोगों को एक नैतिक समुदाय में जोड़ देती है, जिसे चर्च कहते हैं।" टोटम के माध्यम से समाज स्वयं की पूजा करता है।
- सामूहिक प्रतिनिधान साझा विचार, प्रतीक और विश्वास हैं। दुर्खीम ने नैतिक शिक्षा पर भी लिखा और शिक्षा को "युवा पीढ़ी का व्यवस्थित समाजीकरण" कहा।
2.5 मैक्स वेबर (1864–1920), जर्मनी
- प्रमुख पुस्तकें: प्रोटेस्टेंट नीति और पूँजीवाद की आत्मा (1904–05), सामाजिक विज्ञानों की पद्धति, चीन का धर्म (1915), भारत का धर्म (1916), प्राचीन यहूदी धर्म, अर्थव्यवस्था और समाज (मृत्यु के बाद, 1922)।
- सामाजिक क्रिया: कोई क्रिया तब "सामाजिक" होती है जब कर्ता उसे व्यक्तिपरक अर्थ देता है और वह दूसरों के व्यवहार को ध्यान में रखती है। चार प्रकार:
- लक्ष्य-तार्किक / साधन-साध्य तार्किक (Zweckrational) – साधन और साध्य का हिसाब
- मूल्य-तार्किक (Wertrational) – परिणाम कुछ भी हो, किसी मूल्य के लिए क्रिया
- भावात्मक (Affectual) – भावनाओं से प्रेरित
- परंपरागत (Traditional) – प्रथा या आदत से प्रेरित
- बोध / वर्सटेहन (Verstehen) = कर्ता द्वारा दिए गए अर्थ की व्याख्यात्मक समझ।
- आदर्श प्रारूप (Ideal Type) = किसी घटना की मुख्य विशेषताओं को बढ़ा-चढ़ाकर बनाई गई मानसिक रचना। यह तुलना का एक उपकरण है, नैतिक अर्थ में "आदर्श" नहीं। उदाहरण: नौकरशाही, पूँजीवाद।
- सत्ता (वैध शक्ति), तीन प्रकार: परंपरागत, करिश्माई, वैधानिक-तार्किक। समय के साथ करिश्मा नियमित हो जाता है ("करिश्मे का नियमितीकरण")।
- नौकरशाही (आदर्श प्रारूप): पदसोपान, लिखित नियम, अवैयक्तिकता, विशेषीकरण, योग्यता के आधार पर नियुक्ति, वेतनभोगी अधिकारी, फ़ाइलें और अभिलेख। वेबर ने तार्किकता के "लौह पिंजरे" की चेतावनी दी।
- प्रोटेस्टेंट नीति: कैल्विनवादी पूर्वनियति के विश्वास से चिंता पैदा हुई, जिससे कठोर परिश्रम, बचत और सांसारिक तपस्या आई। इसी "आत्मा" ने आधुनिक पूँजीवाद को बढ़ने में मदद की।
- स्तरीकरण: तीन आयाम – वर्ग (आर्थिक), प्रस्थिति (सामाजिक सम्मान), दल (शक्ति)।
- तार्किकीकरण और विश्व का मोहभंग; अनुसंधान में मूल्य-तटस्थता (Wertfreiheit)।
2.6 अन्य विचारक जिनसे प्रश्न आते हैं (अतिरिक्त)
| विचारक | मुख्य अवधारणाएँ / पुस्तकें |
| विल्फ्रेडो पैरेटो (इटली) | द माइंड एंड सोसाइटी (त्रात्तातो, 1916); अभिजात वर्ग का परिभ्रमण; शेर और लोमड़ी; विशिष्ट चालक (Residues) और भ्रान्त तर्क (Derivations); तार्किक और अतार्किक क्रिया |
| जॉर्ज सिमेल (जर्मनी) | स्वरूपात्मक समाजशास्त्र; द फ़िलॉसफ़ी ऑफ़ मनी (1900); "महानगर और मानसिक जीवन" (1903); अजनबी (The Stranger); द्वयी और त्रयी |
| फर्डिनेंड टॉनीज़ | गेमाइनशाफ़्ट और गेसेलशाफ़्ट (1887) – समुदाय बनाम समिति |
| सी.एच. कूले | ह्यूमन नेचर एंड द सोशल ऑर्डर (1902) – आत्म-दर्पण (Looking-glass self); सोशल ऑर्गनाइज़ेशन (1909) – प्राथमिक समूह |
| डब्ल्यू.जी. समनर | फ़ोकवेज़ (1906); जनरीतियाँ, लोकाचार; अंतःसमूह/बाह्यसमूह; स्वजातिकेन्द्रितता |
| ई.ए. रॉस | सोशल कंट्रोल (1901) |
| डब्ल्यू.एफ. ऑगबर्न | सोशल चेंज (1922) – सांस्कृतिक विलम्बना; भौतिक और अभौतिक संस्कृति |
| पी.ए. सोरोकिन | सोशल मोबिलिटी (1927); सोशल एंड कल्चरल डायनेमिक्स (1937–41) – इन्द्रियपरक (Sensate), भावात्मक/विचारात्मक (Ideational) और आदर्शवादी (Idealistic) संस्कृतियाँ |
| टालकट पारसन्स | द स्ट्रक्चर ऑफ़ सोशल एक्शन (1937), द सोशल सिस्टम (1951); AGIL; प्रतिमान चर |
| आर.के. मर्टन | सोशल थ्योरी एंड सोशल स्ट्रक्चर (1949); प्रकट/अप्रकट प्रकार्य; मध्य-स्तरीय सिद्धांत; संदर्भ समूह; भूमिका-पुंज; आदर्शशून्यता सिद्धांत |
| सी. राइट मिल्स | द पावर एलीट (1956); द सोशियोलॉजिकल इमैजिनेशन (1959) |
इकाई 3 – भारतीय समाजशास्त्रीय विचारक
3.1 जी.एस. घुरिये (गोविन्द सदाशिव घुरिये, 1893–1983)
- "भारतीय समाजशास्त्र के जनक"। वे 1924–1959 तक बम्बई विभाग के अध्यक्ष रहे, कैम्ब्रिज में डब्ल्यू.एच.आर. रिवर्स के शिष्य थे, और भारतीय समाजशास्त्रीय परिषद (1951) के संस्थापक थे।
- उपागम: भारतशास्त्रीय (Indological) / पाठ्य-ग्रंथीय – संस्कृत ग्रंथों का प्रयोग, साथ में नृजाति-वर्णन और इतिहास।
- पुस्तकें: कास्ट एंड रेस इन इंडिया (1932); द एबोरिजिन्स – सो-कॉल्ड – एंड देयर फ़्यूचर (1943), बाद में द शेड्यूल्ड ट्राइब्स; इंडियन साधूज़ (1953); इंडियन कॉस्ट्यूम (1951); फ़ैमिली एंड किन इन इंडो-यूरोपियन कल्चर; गोत्र एंड चरण; कल्चर एंड सोसाइटी; सोशल टेंशन्स इन इंडिया; सिटीज़ एंड सिविलाइज़ेशन; वैदिक इंडिया।
- जाति की छः विशेषताएँ (घुरिये):
- समाज का खंडात्मक विभाजन
- संस्तरण (ऊँच-नीच का क्रम)
- भोजन और सामाजिक सहवास पर प्रतिबंध
- विभिन्न वर्गों की नागरिक और धार्मिक निर्योग्यताएँ और विशेषाधिकार
- व्यवसाय के स्वतंत्र चुनाव का अभाव
- विवाह पर प्रतिबंध (अंतर्विवाह)
- जनजातियों के बारे में: उन्होंने उन्हें "पिछड़े हिन्दू" कहा और वेरियर एल्विन के पृथक्करण के विचार के विरुद्ध सात्मीकरण का समर्थन किया।
- जाति की उत्पत्ति के बारे में: जाति इंडो-आर्यन संस्कृति की ब्राह्मणवादी संतान है, जो गंगा के मैदान में विकसित हुई (प्रजातीय और सांस्कृतिक कारकों का मिश्रण)।
3.2 राधाकमल मुकर्जी (1889–1968)
- लखनऊ सम्प्रदाय के संस्थापकों में से एक (डी.पी. मुकर्जी और डी.एन. मजूमदार के साथ)। उन्होंने लखनऊ विश्वविद्यालय में अर्थशास्त्र और समाजशास्त्र पढ़ाया और बाद में कुलपति बने।
- उपागम: अंतर-अनुशासनात्मक और समग्र – अर्थशास्त्र, पारिस्थितिकी, मनोविज्ञान और मूल्यों का मेल।
- भारत में सामाजिक पारिस्थितिकी और क्षेत्रीय समाजशास्त्र के प्रणेता।
- पुस्तकें: द फ़ाउंडेशन्स ऑफ़ इंडियन इकोनॉमिक्स (1916); रीजनल सोशियोलॉजी (1926); सोशल इकोलॉजी; द सोशल स्ट्रक्चर ऑफ़ वैल्यूज़; द डायनेमिक्स ऑफ़ मोरल्स; द सोशल फ़ंक्शन्स ऑफ़ आर्ट; द फ़िलॉसफ़ी ऑफ़ सोशल साइंस; लैंड प्रॉब्लम्स ऑफ़ इंडिया; मैन एंड हिज़ हैबिटेशन।
- मुख्य विचार: मनुष्य, क्षेत्र और समाज अन्योन्याश्रित हैं ("पारिस्थितिक संतुलन"); मूल्यों का समाजशास्त्र, जिसमें मूल्य सामाजिक जीवन का केंद्र हैं; "सार्वभौमिक सभ्यता"; भारतीय परिस्थितियों के संदर्भ में पश्चिमी अर्थशास्त्र की आलोचना।
राधाकमल मुकर्जी को डी.पी. मुकर्जी (धूर्जटि प्रसाद मुकर्जी) से भ्रमित न करें। डी.पी. मुकर्जी भी लखनऊ से थे। वे परंपरा और आधुनिकता पर मार्क्सवादी/द्वंद्वात्मक दृष्टि रखते थे और उन्होंने मॉडर्न इंडियन कल्चर (1942) और डाइवर्सिटीज़ (1958) लिखीं।
3.3 ए.आर. देसाई (अक्षय रमणलाल देसाई, 1915–1994)
- घुरिये के शिष्य। एक मार्क्सवादी समाजशास्त्री, जिन्होंने द्वंद्वात्मक-ऐतिहासिक पद्धति अपनाई।
- पुस्तकें: सोशल बैकग्राउंड ऑफ़ इंडियन नेशनलिज़्म (1948) (भारतीय राष्ट्रवाद की सामाजिक पृष्ठभूमि); रीसेंट ट्रेंड्स इन इंडियन नेशनलिज़्म (1960); रूरल सोशियोलॉजी इन इंडिया (1969, सम्पादित); स्टेट एंड सोसाइटी इन इंडिया (1975); पीज़ेंट स्ट्रगल्स इन इंडिया (1979); एग्रेरियन स्ट्रगल्स इन इंडिया आफ़्टर इंडिपेंडेंस (1986)।
- मुख्य विचार: भारतीय राष्ट्रवाद ब्रिटिश उपनिवेशवाद द्वारा बनाई गई भौतिक परिस्थितियों से पैदा हुआ – नई अर्थव्यवस्था, नए वर्ग, आधुनिक शिक्षा, प्रेस, रेलवे आदि। उन्होंने राष्ट्रवाद के पाँच चरण बताए। उन्होंने स्वतंत्रता के बाद के राज्य को पूँजीवादी बताया और कहा कि सामुदायिक विकास कार्यक्रम और भूमि सुधारों से धनी किसानों को लाभ हुआ।
3.4 एस.सी. दुबे (श्यामाचरण दुबे, 1922–1996)
- ग्राम अध्ययन, विकास और आधुनिकीकरण के मानवशास्त्री और समाजशास्त्री।
- पुस्तकें: द कमार (1951, जनजातीय अध्ययन); इंडियन विलेज (1955) – हैदराबाद के पास शमीरपेट गाँव का अध्ययन; इंडियाज़ चेंजिंग विलेजेज़ (1958, सामुदायिक विकास का प्रभाव); कंटेम्पररी इंडिया एंड इट्स मॉडर्नाइज़ेशन (1974); ट्रेडिशन एंड डेवलपमेंट (1990); भारतीय समाज (एनबीटी); मॉडर्नाइज़ेशन एंड डेवलपमेंट: द सर्च फ़ॉर ऑल्टरनेटिव पैराडाइम्स (1988)।
- मुख्य विचार: गाँव अलग-थलग नहीं है, वह बड़े समाज से जुड़ा है। विकास जन-केन्द्रित और संस्कृति के प्रति संवेदनशील होना चाहिए। उन्होंने आधुनिकीकरण का आलोचनात्मक विश्लेषण किया, और दिखाया कि सामुदायिक विकास कार्यक्रम में अधिकारियों और ग्रामीणों के बीच "संचार अंतराल" था।
3.5 अन्य भारतीय विचारक (वैकल्पिक सूची और बार-बार पूछे जाने वाले)
| विचारक | मुख्य कृतियाँ और अवधारणाएँ |
| एम.एन. श्रीनिवास | रिलीजन एंड सोसाइटी अमंग द कुर्गस ऑफ़ साउथ इंडिया (1952) – संस्कृतिकरण; "प्रभु जाति" (1955, रामपुरा गाँव, मैसूर); सोशल चेंज इन मॉडर्न इंडिया (1966) – पश्चिमीकरण, धर्मनिरपेक्षीकरण; द रिमेम्बर्ड विलेज (1976); "वोट बैंक" (शब्द उन्होंने लोकप्रिय किया); "पुस्तकीय दृष्टिकोण बनाम क्षेत्रीय दृष्टिकोण" |
| श्री अरविंद | द ह्यूमन साइकिल; द आइडियल ऑफ़ ह्यूमन यूनिटी; द लाइफ़ डिवाइन। मनोवैज्ञानिक अवस्थाओं से सामाजिक विकास: प्रतीकात्मक → प्रारूपिक → परंपरागत → व्यक्तिवादी → आत्मनिष्ठ (→ आध्यात्मिक युग)। राष्ट्रवाद को आध्यात्मिक माना। |
| महात्मा गांधी | हिन्द स्वराज (1909); सत्याग्रह; सर्वोदय (सबका कल्याण; रस्किन की अन टू दिस लास्ट से प्रेरित); न्यासिता (ट्रस्टीशिप); ग्राम स्वराज; विकेन्द्रीकरण; बुनियादी शिक्षा (नई तालीम, वर्धा 1937); "हरिजन" शब्द |
| भगवान दास | द साइंस ऑफ़ सोशल ऑर्गनाइज़ेशन, ऑर द लॉज़ ऑफ़ मनु इन द लाइट ऑफ़ आत्म-विद्या; द साइंस ऑफ़ पीस; द साइंस ऑफ़ द इमोशन्स। उन्होंने वर्ण और आश्रम को जन्म नहीं, स्वभाव (गुण) पर आधारित एक वैज्ञानिक सामाजिक संगठन के रूप में समझाया। भारत रत्न 1955। |
| डॉ. बी.आर. आंबेडकर | कास्ट्स इन इंडिया: देयर मैकेनिज़्म, जेनेसिस एंड डेवलपमेंट (1916, कोलंबिया) – जाति = एक बंद वर्ग, जो अंतर्विवाह से बनी रहती है; जाति का उन्मूलन (Annihilation of Caste, 1936); शूद्र कौन थे? (1946); द अनटचेबल्स (1948); बुद्ध और उनका धम्म (1957) |
| डी.एन. मजूमदार | रेसेज़ एंड कल्चर्स ऑफ़ इंडिया; कास्ट एंड कम्युनिकेशन इन एन इंडियन विलेज (मोहाना, लखनऊ के पास); हो जनजाति का अध्ययन |
| इरावती कर्वे | किनशिप ऑर्गनाइज़ेशन इन इंडिया (1953) – नातेदारी के चार क्षेत्र; हिन्दू सोसाइटी: एन इंटरप्रिटेशन |
| के.एम. कपाड़िया | हिन्दू किनशिप (1947); मैरिज एंड फ़ैमिली इन इंडिया (1955) |
| पी.एच. प्रभु | हिन्दू सोशल ऑर्गनाइज़ेशन |
| योगेन्द्र सिंह | मॉडर्नाइज़ेशन ऑफ़ इंडियन ट्रेडिशन (1973) |
| आन्द्रे बेते | कास्ट, क्लास एंड पावर (1965, श्रीपुरम गाँव, तंजौर) |
| लुई ड्यूमों (फ्रांसीसी) | होमो हाइरारकिकस (1966) – जाति शुद्धता और अशुद्धता के विरोध पर आधारित |
| वेरियर एल्विन | द बैगा (1939); जनजातीय पृथक्करण की नीति ("राष्ट्रीय उद्यान"); नेफ़ा (NEFA) के सलाहकार |
| रजनी कोठारी | कास्ट इन इंडियन पॉलिटिक्स (1970) |
इकाई 4 – समाजशास्त्रीय सिद्धांत
4.1 प्रकार्यवाद (संरचनात्मक-प्रकार्यवाद)
- मूल विचार: समाज परस्पर संबंधित अंगों की एक व्यवस्था है। हर अंग (संस्था) एक प्रकार्य करता है जो पूरी व्यवस्था को बनाए रखने में सहायक होता है; व्यवस्था संतुलन और सहमति की ओर झुकती है।
- जड़ें: कॉम्ट, स्पेंसर (सावयवी सादृश्य), दुर्खीम।
- ब्रोनिस्लॉ मैलिनोव्स्की: "व्यक्तिवादी" या मनोवैज्ञानिक प्रकार्यवाद। संस्कृति बुनियादी जैविक आवश्यकताओं को पूरा करती है। ट्रोब्रियांड द्वीप में क्षेत्रकार्य; आर्गोनॉट्स ऑफ़ द वेस्टर्न पैसिफ़िक (1922)।
- ए.आर. रैडक्लिफ़-ब्राउन: संरचनात्मक-प्रकार्यवाद। किसी अंग का प्रकार्य है सामाजिक संरचना को बनाए रखने में उसका योगदान। द अंडमान आइलैंडर्स (1922)।
- टालकट पारसन्स:
- AGIL – किसी भी व्यवस्था की प्रकार्यात्मक पूर्व-आवश्यकताएँ: A – अनुकूलन (Adaptation – अर्थव्यवस्था), G – लक्ष्य प्राप्ति (Goal attainment – राजव्यवस्था), I – एकीकरण (Integration – कानून, धर्म), L – प्रतिमान अनुरक्षण / अव्यक्तता (Latency – परिवार, शिक्षा)।
- प्रतिमान चर (Pattern Variables, चुनाव के पाँच जोड़े): भावात्मकता बनाम भावात्मक तटस्थता; विस्तीर्णता बनाम विशिष्टता; विशिष्टतावाद बनाम सार्वभौमिकतावाद; प्रदत्त (गुण) बनाम अर्जित (उपलब्धि); सामूहिक अभिमुखता बनाम स्व-अभिमुखता।
- क्रिया का ऐच्छिक सिद्धांत; सामाजिक व्यवस्था, सांस्कृतिक व्यवस्था, व्यक्तित्व व्यवस्था।
- रॉबर्ट के. मर्टन:
- प्रकट प्रकार्य (इच्छित, मान्य) बनाम अप्रकट प्रकार्य (अनिच्छित, अमान्य)। उदाहरण: होपी जनजाति के वर्षा नृत्य का प्रकट प्रकार्य वर्षा लाना है, अप्रकट प्रकार्य समूह की एकता।
- अकार्य / दुष्प्रकार्य (Dysfunction), अप्रकार्य, प्रकार्यात्मक विकल्प (समतुल्य)।
- उन्होंने तीन मान्यताओं की आलोचना की: प्रकार्यात्मक एकता, सार्वभौमिक प्रकार्यवाद और अनिवार्यता।
- मध्य-स्तरीय सिद्धांत।
- आलोचना: रूढ़िवादी झुकाव; संघर्ष और परिवर्तन की उपेक्षा; उद्देश्यवादी (टेलिओलॉजिकल)।
4.2 संघर्ष सिद्धांत
- मूल विचार: समाज में असमानता है और दुर्लभ संसाधनों और शक्ति के लिए प्रतिस्पर्धा होती है। संघर्ष ही परिवर्तन का स्रोत है।
- कार्ल मार्क्स: मालिकों और मज़दूरों के बीच वर्ग संघर्ष (इकाई 2 देखें)।
- राल्फ़ डेहरेनडॉर्फ़: क्लास एंड क्लास कॉन्फ़्लिक्ट इन इंडस्ट्रियल सोसाइटी (1959)। संघर्ष संपत्ति पर नहीं, सत्ता (प्राधिकार) पर आधारित है, "अनिवार्य रूप से समन्वित संघों" (ICA) के भीतर। उन्होंने अर्ध-समूहों और हित-समूहों की बात की।
- लुईस कोज़र: द फ़ंक्शन्स ऑफ़ सोशल कॉन्फ़्लिक्ट (1956)। संघर्ष प्रकार्यात्मक हो सकता है: यह समूह की एकता बढ़ाता है और "सुरक्षा वाल्व" का काम करता है। वास्तविक बनाम अवास्तविक संघर्ष।
- सी. राइट मिल्स: शक्ति-अभिजन (सैन्य, कॉरपोरेट, राजनीतिक)।
- रैंडल कॉलिन्स: संघर्ष समाजशास्त्र (सूक्ष्म स्तर)।
- फ्रैंकफ़र्ट सम्प्रदाय (अडोर्नो, होर्खाइमर, मारक्यूज़, हैबरमास) ने आलोचनात्मक सिद्धांत विकसित किया। एंटोनियो ग्राम्शी ने वर्चस्व (हेजेमनी) की अवधारणा दी।
4.3 सामाजिक परिवर्तन के सिद्धांत
| प्रकार | विचारक | मुख्य विचार |
| उद्विकासीय (रेखीय) | कॉम्ट | तीन अवस्थाओं का नियम |
| स्पेंसर | सरल → जटिल; सैनिक → औद्योगिक |
| एल.एच. मॉर्गन | एन्शिएंट सोसाइटी (1877): जंगली अवस्था → बर्बर अवस्था → सभ्यता |
| चक्रीय | ओसवाल्ड स्पेंगलर | द डिक्लाइन ऑफ़ द वेस्ट (1918): सभ्यताएँ जीवों की तरह जन्म लेती हैं, बढ़ती हैं, क्षीण होती हैं और मर जाती हैं |
| आर्नल्ड टॉयनबी | ए स्टडी ऑफ़ हिस्ट्री: चुनौती और प्रत्युत्तर; सृजनशील अल्पसंख्यक |
| विल्फ्रेडो पैरेटो | अभिजात वर्ग का परिभ्रमण (शेर बनाम लोमड़ी) |
| पी.ए. सोरोकिन | इन्द्रियपरक, विचारात्मक और आदर्शवादी संस्कृतियों के बीच उतार-चढ़ाव ("घड़ी के पेंडुलम" जैसा सिद्धांत) |
| संघर्ष / द्वंद्वात्मक | कार्ल मार्क्स | वर्ग संघर्ष और उत्पादन प्रणाली के अंतर्विरोधों से परिवर्तन |
| प्रौद्योगिकीय | डब्ल्यू.एफ. ऑगबर्न; थॉर्स्टीन वेबलेन | प्रौद्योगिकी पहले बदलती है और भौतिक संस्कृति अभौतिक संस्कृति से तेज़ बदलती है, जिससे सांस्कृतिक विलम्बना पैदा होती है |
| प्रकार्यात्मक / संतुलन | टालकट पारसन्स | परिवर्तन क्रमिक और अनुकूलनशील होता है, "गतिशील संतुलन"; संरचनात्मक विभेदीकरण |
| प्रसारवादी | इलियट स्मिथ, पेरी (ब्रिटिश); बोआस (अमेरिकी) | सांस्कृतिक तत्वों के आदान-प्रदान से परिवर्तन फैलता है |
4.4 प्रतीकात्मक अंतःक्रियावाद
- मूल विचार: लोग वस्तुओं के प्रति उन अर्थों के आधार पर कार्य करते हैं जो उन वस्तुओं के उनके लिए होते हैं। ये अर्थ प्रतीकों, विशेषकर भाषा, के माध्यम से अंतःक्रिया में बनते हैं। यह सूक्ष्म-स्तरीय सिद्धांत है।
- जॉर्ज हर्बर्ट मीड: माइंड, सेल्फ़ एंड सोसाइटी (1934, मृत्यु के बाद)। स्व (Self) के दो भाग हैं: "मैं" (I) – स्वतःस्फूर्त, सृजनशील – और "मुझे" (Me) – समाजीकृत स्व, दूसरों की अभिवृत्तियाँ। स्व के विकास की अवस्थाएँ: प्रारंभिक (अनुकरण) → खेल (Play) → क्रीड़ा (Game)। सामान्यीकृत अन्य; महत्वपूर्ण अन्य; भूमिका-ग्रहण।
- चार्ल्स हॉर्टन कूले: आत्म-दर्पण (Looking-glass self) (1902), तीन तत्व: (1) हम कल्पना करते हैं कि हम दूसरों को कैसे दिखते हैं, (2) हम कल्पना करते हैं कि वे हमारा कैसा मूल्यांकन करते हैं, (3) इससे पैदा हुई आत्म-भावना (गर्व या लज्जा)।
- हर्बर्ट ब्लूमर: "प्रतीकात्मक अंतःक्रियावाद" शब्द गढ़ा (1937)। तीन मान्यताएँ: (1) मनुष्य वस्तुओं के प्रति उनके अर्थ के आधार पर कार्य करता है, (2) अर्थ सामाजिक अंतःक्रिया से पैदा होते हैं, (3) व्याख्या की प्रक्रिया से अर्थ बदलते रहते हैं।
- डब्ल्यू.आई. थॉमस: "परिस्थिति की परिभाषा"। थॉमस प्रमेय: "यदि लोग किसी परिस्थिति को वास्तविक मान लेते हैं, तो वह अपने परिणामों में वास्तविक हो जाती है।"
- इरविंग गॉफ़मैन: द प्रेज़ेंटेशन ऑफ़ सेल्फ़ इन एवरीडे लाइफ़ (1959) – नाटकीयता उपागम (Dramaturgy), मंच का अग्रभाग / पृष्ठभाग, प्रभाव-प्रबंधन। असाइलम्स (1961) – सम्पूर्ण संस्थाएँ। स्टिग्मा (1963)।
- सम्प्रदाय: शिकागो सम्प्रदाय (ब्लूमर), आयोवा सम्प्रदाय (मैनफ़ोर्ड कुह्न)।
4.5 घटनाक्रियाशास्त्र (प्रघटनाशास्त्र) और नृजाति पद्धतिशास्त्र
- एडमंड हुसर्ल ने दर्शनशास्त्र में घटनाक्रियाशास्त्र की स्थापना की। यह चेतना का और इस बात का अध्ययन करता है कि संसार लोगों को कैसा दिखता है ("कोष्ठीकरण" या एपोके)।
- अल्फ्रेड शुट्ज़: घटनाक्रियाशास्त्रीय समाजशास्त्र के संस्थापक; द फ़ेनोमेनोलॉजी ऑफ़ द सोशल वर्ल्ड (1932)। मुख्य विचार: जीवन-जगत (Lebenswelt), प्रारूपीकरण (Typifications), ज्ञान का भण्डार, अंतर्व्यक्तिपरकता, "हम-संबंध"।
- पीटर बर्जर और थॉमस लकमैन: द सोशल कंस्ट्रक्शन ऑफ़ रियलिटी (1966) (यथार्थ का सामाजिक निर्माण)। तीन चरण: बाह्यीकरण → वस्तुकरण → आंतरीकरण।
- हैरोल्ड गारफ़िंकेल: नृजाति पद्धतिशास्त्र (Ethnomethodology); स्टडीज़ इन एथ्नोमेथडोलॉजी (1967)। यह उन तरीकों का अध्ययन करता है जिनसे लोग दैनिक जीवन को समझ में आने लायक बनाते हैं। भंग-प्रयोग (Breaching experiments); अनुक्रमिकता (Indexicality); प्रतिवर्तिता (Reflexivity)।
इकाई 5 – प्रमुख सामाजिक संस्थाएँ
5.1 परिवार
- मैकाइवर एवं पेज: "परिवार एक ऐसा समूह है जो यौन संबंधों पर आधारित है, जो इतना छोटा और स्थायी है कि उसमें संतान का जन्म और पालन-पोषण हो सके।"
- बर्गेस एवं लॉक: "विवाह, रक्त या गोद लेने के बंधनों से जुड़े व्यक्तियों का समूह, जो एक गृहस्थी बनाते हैं और अपनी-अपनी सामाजिक भूमिकाओं में अंतःक्रिया करते हैं।"
- जी.पी. मरडॉक (सोशल स्ट्रक्चर, 1949; 250 समाजों का अध्ययन): केंद्रीय (नाभिकीय) परिवार सार्वभौमिक है। इसके चार प्रकार्य हैं: यौन, प्रजनन, आर्थिक, शैक्षणिक।
- टालकट पारसन्स: दो "मूल और अपरिहार्य" प्रकार्य – बच्चों का प्राथमिक समाजीकरण और वयस्क व्यक्तित्व का स्थिरीकरण।
- डब्ल्यू.एल. वार्नर: जन्म का परिवार (Family of orientation) बनाम प्रजनन का परिवार (Family of procreation – अपने विवाह से बना)।
| आधार | प्रकार |
| संरचना | केंद्रीय (नाभिकीय), संयुक्त, विस्तृत |
| वंश | पितृवंशीय, मातृवंशीय (खासी, गारो – मेघालय; नायर – केरल), द्विपक्षीय |
| निवास | पितृस्थानीय, मातृस्थानीय, नवस्थानीय, मातुलस्थानीय (मामा के साथ), द्विस्थानीय |
| सत्ता | पितृसत्तात्मक, मातृसत्तात्मक |
| विवाह | एकविवाही, बहुविवाही (बहुपत्नी, बहुपति) |
5.2 विवाह
- वेस्टरमार्क (द हिस्ट्री ऑफ़ ह्यूमन मैरिज, 1891): "स्त्री और पुरुष का एक कम या अधिक स्थायी संबंध, जो केवल प्रजनन क्रिया तक सीमित न होकर संतान के जन्म के बाद तक बना रहता है।"
- प्रकार:
- एकविवाह (एक जीवनसाथी); क्रमिक एकविवाह।
- बहुपत्नी विवाह (एक पुरुष, अनेक पत्नियाँ); भगिनी बहुपत्नी विवाह का अर्थ है बहनों से विवाह।
- बहुपति विवाह (एक स्त्री, अनेक पति)। भ्रातृक (Fraternal/Adelphic): पति आपस में भाई होते हैं – टोडा (नीलगिरि), जौनसार-बावर के खस। अभ्रातृक: नायर (केरल)।
- समूह विवाह – अनेक पुरुषों का अनेक स्त्रियों से विवाह (दुर्लभ)।
- जीवनसाथी चुनने के नियम:
- अंतर्विवाह: समूह के भीतर विवाह (जाति, उपजाति, धर्म)।
- बहिर्विवाह: समूह के बाहर विवाह (गोत्र, प्रवर, सपिंड, गाँव, टोटम)।
- अनुलोम (Hypergamy): स्त्री का अपने से उच्च स्थिति वाले पुरुष से विवाह। प्रतिलोम (Hypogamy): स्त्री का अपने से निम्न स्थिति वाले पुरुष से विवाह।
- अधिमान्य विवाह: ममेरे-फुफेरे भाई-बहन (Cross-cousin – भाई और बहन की संतानें; दक्षिण भारत में प्रचलित), चचेरे-मौसेरे (Parallel cousin – दो भाइयों या दो बहनों की संतानें; मुसलमानों में अधिमान्य), देवर विवाह (Levirate – विधवा का मृत पति के भाई से विवाह), साली विवाह (Sororate – विधुर का मृत पत्नी की बहन से विवाह)।
- जीवनसाथी प्राप्त करने के तरीके: अपहरण द्वारा, परीक्षा द्वारा, क्रय द्वारा (वधू-मूल्य – कई जनजातियों में प्रचलित, जैसे गोंड और भील), सेवा द्वारा, विनिमय द्वारा, पारस्परिक सहमति से, सह-पलायन।
5.3 नातेदारी
- दो प्रकार: रक्त संबंधी (समरक्त) और विवाह संबंधी।
- श्रेणियाँ: प्राथमिक (8 प्राथमिक संबंधी – पिता, माता, भाई, बहन, पति, पत्नी, पुत्र, पुत्री), द्वितीयक (33), तृतीयक (151) – जी.पी. मरडॉक।
- वंश समूह: वंश (Lineage) → गोत्र/कुल (Clan/Sib) → भ्रातृदल (Phratry) → अर्धांश (Moiety)।
- नातेदारी शब्दावली: एल.एच. मॉर्गन, सिस्टम्स ऑफ़ कॉन्सैंग्विनिटी एंड एफ़िनिटी ऑफ़ द ह्यूमन फ़ैमिली (1871)। वर्गात्मक (कई संबंधियों के लिए एक शब्द) बनाम विवरणात्मक (एक संबंधी के लिए एक शब्द)।
- नातेदारी रीतियाँ:
| रीति | अर्थ |
| परिहार (Avoidance) | संबंधी एक-दूसरे से दूरी रखते हैं, जैसे बहू और ससुर। |
| परिहास संबंध (Joking relationship) | हँसी-मज़ाक की छूट होती है, जैसे देवर-भाभी या जीजा-साली। |
| माध्यमिक संबोधन (Teknonymy) | किसी व्यक्ति को उसकी संतान के माध्यम से पुकारना (जैसे "मुन्ना के पापा")। यह शब्द ई.बी. टायलर ने दिया। |
| मातुलेय (Avunculate) | मामा को भांजे-भांजियों पर विशेष अधिकार होता है। |
| पितृश्वसेय (Amitate) | बुआ का विशेष महत्व होता है। |
| सहप्रसविता (Couvade) | पति, पत्नी की प्रसव-पीड़ा और प्रसव के बाद के प्रतिबंधों का अनुकरण करता है (खासी, टोडा)। |
- इरावती कर्वे के नातेदारी क्षेत्र: उत्तरी, मध्य, दक्षिणी, पूर्वी।
- क्लॉड लेवी-स्ट्रॉस: द एलिमेंटरी स्ट्रक्चर्स ऑफ़ किनशिप (1949) – संधि (गठबंधन) सिद्धांत; स्त्रियों का विनिमय; निषिद्ध यौन संबंध (इन्सेस्ट टैबू) संस्कृति का आधार।
5.4 धर्म
| विचारक | धर्म का सिद्धांत |
| ई.बी. टायलर | जीववाद (Animism) – "आध्यात्मिक सत्ताओं में विश्वास"; प्रिमिटिव कल्चर (1871); स्वप्न और आत्मा के विचार से उत्पत्ति |
| मैक्स मूलर | प्रकृतिवाद (Naturism) – प्रकृति की शक्तियों की पूजा |
| आर.आर. मैरेट | जीवित सत्तावाद / मानावाद (Animatism) – एक अवैयक्तिक अलौकिक शक्ति (माना, मेलानेशियाई शब्द, जिसका वर्णन कोडरिंगटन ने किया) में विश्वास |
| जे.जी. फ्रेज़र | द गोल्डन बाउ (1890): जादू → धर्म → विज्ञान का विकास; सहानुभूतिक जादू (अनुकरणात्मक, संसर्गात्मक) |
| दुर्खीम | टोटमवाद; पवित्र बनाम अपवित्र; धर्म = समाज द्वारा स्वयं की पूजा |
| मैलिनोव्स्की | मैजिक, साइंस एंड रिलीजन; संकट के समय धर्म चिंता कम करता है |
| मार्क्स | धर्म "जनता की अफ़ीम" है; शासक वर्ग की विचारधारा |
| वेबर | धर्म आर्थिक परिवर्तन ला सकता है (प्रोटेस्टेंट नीति) |
धर्म के प्रकार्य: सामाजिक एकता, सामाजिक नियंत्रण, जीवन का अर्थ और भावनात्मक सहारा, मानदंडों को वैधता, और सामाजिक परिवर्तन का आधार (जैसे भक्ति आंदोलन, सुधार आंदोलन)।
इकाई 6 – सामाजिक प्रक्रियाएँ
सामाजिक प्रक्रिया = सामाजिक अंतःक्रिया का बार-बार होने वाला स्वरूप। पार्क एवं बर्गेस (इंट्रोडक्शन टू द साइंस ऑफ़ सोशियोलॉजी, 1921) ने चार मुख्य प्रक्रियाएँ बताईं: प्रतिस्पर्धा, संघर्ष, व्यवस्थापन, सात्मीकरण।
| सहयोगी (संगठनात्मक / संयोजक) | असहयोगी (विघटनात्मक / वियोजक) |
| सहयोग, व्यवस्थापन (समायोजन), सात्मीकरण, पर-संस्कृतिग्रहण | प्रतिस्पर्धा, संघर्ष (और प्रतिकूलता) |
6.1 सहयोग
- एक सामान्य लक्ष्य के लिए मिलकर काम करना। यह सबसे मूल और सार्वभौमिक प्रक्रिया है।
- मैकाइवर: प्रत्यक्ष (साथ-साथ काम करना) बनाम अप्रत्यक्ष (एक लक्ष्य के लिए अलग-अलग काम, जैसे श्रम विभाजन में)।
- ऑगबर्न एवं निमकॉफ़: सामान्य सहयोग, मैत्रीपूर्ण सहयोग, सहायक सहयोग।
6.2 व्यवस्थापन (समायोजन)
- संघर्ष कम करने के लिए विरोधी व्यक्तियों या समूहों के बीच समायोजन। संघर्ष समाप्त हो जाता है पर मतभेद बने रह सकते हैं। मैकाइवर ने इसे पर्यावरण के साथ समायोजन की प्रक्रिया कहा।
- स्वरूप: बल-प्रयोग (दमन), समझौता, मध्यस्थता (पंच निर्णय), सुलह/समझौता-वार्ता, सहिष्णुता, धर्म-परिवर्तन, उदात्तीकरण, औचित्य-स्थापन (युक्तिकरण), अधीनता–अधिनायकता।
- उदाहरण: समूहों के बीच व्यवस्थापन के रूप में जाति व्यवस्था।
6.3 सात्मीकरण (आत्मसात्करण)
- पार्क एवं बर्गेस: "अंतर्प्रवेश और विलयन की वह प्रक्रिया जिसमें व्यक्ति और समूह दूसरे व्यक्तियों और समूहों की स्मृतियाँ, भावनाएँ और मनोवृत्तियाँ ग्रहण कर लेते हैं।"
- विशेषताएँ: धीमी, क्रमिक, अचेतन, दो-तरफ़ा। सहायक कारक: सहिष्णुता, अंतर्विवाह, सांस्कृतिक समानता। बाधक: स्वजातिकेन्द्रितता, पूर्वाग्रह।
- पर-संस्कृतिग्रहण (Acculturation): समूहों के लगातार संपर्क से संस्कृति में होने वाला परिवर्तन (रेडफ़ील्ड, लिंटन और हर्स्कोविट्स, 1936)।
6.4 प्रतिस्पर्धा बनाम संघर्ष
| प्रतिस्पर्धा | संघर्ष |
| अवैयक्तिक | वैयक्तिक |
| अचेतन | चेतन |
| निरंतर | अनिरंतर (कभी-कभी) |
| नियमों का पालन; अहिंसक | हिंसक हो सकता है; विरोधी को हराना या समाप्त करना उद्देश्य |
| ध्यान लक्ष्य (दुर्लभ पुरस्कार) पर | ध्यान प्रतिद्वंद्वी पर |
संघर्ष के प्रकार (सिमेल और अन्य): व्यक्तिगत, प्रजातीय, वर्ग, राजनीतिक, अंतर्राष्ट्रीय। गिलिन एवं गिलिन ने सामाजिक प्रक्रियाओं को सहयोगी और असहयोगी में बाँटा।
इकाई 7 – मूल अवधारणाएँ और सामाजिक स्तरीकरण
7.1 समाज, समुदाय, समिति, संस्था
| अवधारणा | परिभाषा | मुख्य विशेषताएँ |
| समाज | मैकाइवर एवं पेज: "समाज सामाजिक संबंधों का जाल है।" | अमूर्त; समानता और भिन्नता; अन्योन्याश्रितता; सहयोग और संघर्ष; गतिशील |
| समुदाय | मैकाइवर: "सामाजिक जीवन का वह क्षेत्र जिसमें कुछ अंश तक सामाजिक सम्बद्धता (सामंजस्य) पाई जाती है।" | दो आधार: निश्चित भू-भाग (स्थानीयता) + सामुदायिक भावना (हम की भावना, भूमिका की भावना, निर्भरता की भावना)। मूर्त; जान-बूझकर नहीं बनाया जाता। उदाहरण: गाँव, नगर, जनजाति। |
| समिति | मैकाइवर: "किसी हित या हितों की सामूहिक पूर्ति के लिए जान-बूझकर बनाया गया संगठन।" | जान-बूझकर बनाई जाती है; एक विशेष उद्देश्य; नियम होते हैं; सदस्यता ऐच्छिक; मूर्त। उदाहरण: विद्यालय, श्रमिक संघ, राजनीतिक दल। |
| संस्था | मैकाइवर एवं पेज: "समूह की गतिविधियों की विशेषता बताने वाली कार्य-प्रणाली के स्थापित स्वरूप या दशाएँ।" | अमूर्त; मानदंडों की व्यवस्था; स्थायी; बुनियादी आवश्यकताएँ पूरी करती है। उदाहरण: विवाह, परिवार (एक व्यवस्था के रूप में), संपत्ति, धर्म। |
याद रखने की युक्ति: हम समिति के सदस्य होते हैं; संस्था के सदस्य नहीं होते। विद्यालय (भवन और सदस्य) समिति है; शिक्षा संस्था है।
7.2 सामाजिक समूह
| वर्गीकरण | विचारक | विवरण |
| प्राथमिक और द्वितीयक समूह | सी.एच. कूले (सोशल ऑर्गनाइज़ेशन, 1909) | प्राथमिक: आमने-सामने के, घनिष्ठ, छोटे, "मानव स्वभाव की पालना" (परिवार, क्रीड़ा समूह, पड़ोस)। द्वितीयक: अवैयक्तिक, बड़े, उद्देश्य-केन्द्रित (यह शब्द बाद में आया)। |
| अंतःसमूह और बाह्यसमूह | डब्ल्यू.जी. समनर (फ़ोकवेज़, 1906) | अंतःसमूह: "हम" की भावना; बाह्यसमूह: "वे" की भावना। इससे स्वजातिकेन्द्रितता पैदा होती है। |
| संदर्भ समूह | शब्द हर्बर्ट हाइमन ने गढ़ा (1942); विकास आर.के. मर्टन ने किया | वह समूह जिसके मानकों से व्यक्ति स्वयं का मूल्यांकन करता है। "सापेक्षिक वंचना" और "प्रत्याशित समाजीकरण" से जुड़ा। |
| गेमाइनशाफ़्ट और गेसेलशाफ़्ट | एफ. टॉनीज़ (1887) | समुदाय (स्वाभाविक इच्छा) बनाम समिति (तार्किक इच्छा) |
| क्षैतिज और ऊर्ध्वाधर समूह | सोरोकिन | — |
| अनैच्छिक और ऐच्छिक समूह | चार्ल्स ए. एलवुड | — |
7.3 प्रस्थिति और भूमिका
- राल्फ़ लिंटन (द स्टडी ऑफ़ मैन, 1936): प्रस्थिति समाज में व्यक्ति का स्थान है; भूमिका प्रस्थिति का गतिशील या व्यवहारिक पक्ष है।
- प्रदत्त प्रस्थिति (जन्म से: जाति, लिंग, आयु) बनाम अर्जित प्रस्थिति (प्रयास से: डॉक्टर, शिक्षक, आईएएस)।
- भूमिका-पुंज (Role-set) (आर.के. मर्टन): एक प्रस्थिति से जुड़े भूमिका-संबंधों का समूह। उदाहरण: एक शिक्षक का विद्यार्थियों, प्रधानाचार्य और अभिभावकों से संबंध।
- प्रस्थिति-पुंज (Status-set): व्यक्ति की सभी प्रस्थितियाँ। प्रधान प्रस्थिति (Master status, ई. ह्यूज़) सबसे प्रमुख प्रस्थिति है। भूमिका-संघर्ष बनाम भूमिका-तनाव।
7.4 सामाजिक स्तरीकरण
- धन, शक्ति, प्रतिष्ठा आदि के आधार पर लोगों को स्तरों (परतों) में ऊँच-नीच के क्रम में व्यवस्थित करना।
- मेल्विन ट्यूमिन की विशेषताएँ: सामाजिक, प्राचीन, सार्वभौमिक, विविध रूपों वाला, और परिणामजनक (जीवन के अवसरों को प्रभावित करता है)।
- स्वरूप: दास प्रथा, सम्पदा (एस्टेट) (सामंती यूरोप), जाति (बंद), वर्ग (खुला)।
| सिद्धांत | विचारक | मुख्य विचार |
| प्रकार्यवादी | किंग्सले डेविस और विल्बर्ट मूर (1945) | स्तरीकरण सार्वभौमिक और आवश्यक है। महत्वपूर्ण पदों के लिए योग्य लोग चाहिए, जिन्हें अधिक पुरस्कार देकर प्रेरित करना होता है। मेल्विन ट्यूमिन (1953) ने इसकी आलोचना की। |
| मार्क्सवादी | कार्ल मार्क्स | उत्पादन के साधनों के स्वामित्व पर आधारित दो वर्ग; स्तरीकरण से शोषण और संघर्ष। |
| वेबरवादी (बहुआयामी) | मैक्स वेबर | वर्ग, प्रस्थिति, दल। |
7.5 सामाजिक गतिशीलता
- पी.ए. सोरोकिन, सोशल मोबिलिटी (1927) – पहला व्यवस्थित अध्ययन।
- ऊर्ध्वाधर गतिशीलता (ऊपर या नीचे) बनाम क्षैतिज गतिशीलता (उसी स्तर पर स्थिति बदलना)।
- अंतरपीढ़ी (माता-पिता और संतान के बीच) बनाम अंतःपीढ़ी (एक ही व्यक्ति के जीवन में)।
- संरचनात्मक गतिशीलता अर्थव्यवस्था में बदलाव से होती है।
- खुले समाज (वर्ग) में गतिशीलता अधिक होती है; बंद समाज (जाति) में कम।
इकाई 8 – पारिस्थितिक पर्यावरण, संस्कृति और व्यक्तित्व, समाजीकरण, सामाजिक नियंत्रण, सामाजिक परिवर्तन
8.1 पर्यावरण और मानव समाज (मानव पारिस्थितिकी)
- शिकागो सम्प्रदाय (रॉबर्ट पार्क, अर्नेस्ट बर्गेस, आर.डी. मैकेंज़ी) ने मानव पारिस्थितिकी की स्थापना की। नगर को एक पारिस्थितिक व्यवस्था के रूप में देखा जाता है।
- संकेन्द्रीय क्षेत्र सिद्धांत – ई.डब्ल्यू. बर्गेस (1925), 5 क्षेत्र: (1) केंद्रीय व्यापार क्षेत्र, (2) संक्रमण क्षेत्र, (3) श्रमिकों के आवास का क्षेत्र, (4) आवासीय क्षेत्र, (5) यात्री (कम्यूटर) क्षेत्र।
- त्रिज्यखंड (सेक्टर) मॉडल – होमर हॉयट (1939)। बहु-केन्द्रक मॉडल – हैरिस और उलमैन (1945)।
- पारिस्थितिक प्रक्रियाएँ: संकेन्द्रण, केन्द्रीकरण, पृथक्करण, आक्रमण, अनुक्रमण।
- पर्यावरणीय निर्धारणवाद (रैटज़ेल, हंटिंगटन) बनाम सम्भववाद। राधाकमल मुकर्जी की सामाजिक पारिस्थितिकी।
- भारत के पर्यावरण आंदोलन: चिपको (1973, उत्तराखंड; सुन्दरलाल बहुगुणा, चंडीप्रसाद भट्ट, रैणी गाँव की गौरा देवी); अप्पिको (कर्नाटक, 1983); नर्मदा बचाओ आंदोलन (मेधा पाटकर, 1985); साइलेंट वैली (केरल)।
- सतत विकास: ब्रंटलैंड रिपोर्ट, अवर कॉमन फ़्यूचर (1987): "वह विकास जो भावी पीढ़ियों की आवश्यकताओं से समझौता किए बिना वर्तमान की आवश्यकताएँ पूरी करे।"
8.2 संस्कृति
- ई.बी. टायलर (प्रिमिटिव कल्चर, 1871): "संस्कृति वह जटिल समग्रता है जिसमें ज्ञान, विश्वास, कला, नैतिकता, कानून, प्रथा तथा अन्य वे सभी क्षमताएँ और आदतें शामिल हैं जिन्हें मनुष्य समाज का सदस्य होने के नाते प्राप्त करता है।"
- विशेषताएँ: सीखी जाती है, साझा होती है, हस्तांतरित होती है, प्रतीकात्मक है, अनुकूलनशील है, संचयी है, हर समाज में अलग होती है।
- भौतिक बनाम अभौतिक संस्कृति (ऑगबर्न)। सांस्कृतिक विलम्बना = अभौतिक संस्कृति भौतिक संस्कृति से पीछे रह जाती है।
- सांस्कृतिक तत्व (सबसे छोटी इकाई) → सांस्कृतिक संकुल → सांस्कृतिक प्रतिमान।
- स्वजातिकेन्द्रितता (समनर) बनाम सांस्कृतिक सापेक्षवाद (बोआस)। उप-संस्कृति, प्रति-संस्कृति; सांस्कृतिक आघात (कलर्वो ओबर्ग)।
- क्रोबर: संस्कृति अधिसावयवी है।
8.3 संस्कृति और व्यक्तित्व
| विचारक | योगदान |
| रूथ बेनेडिक्ट | पैटर्न्स ऑफ़ कल्चर (1934): अपोलोनियन (ज़ूनी, शांत) बनाम डायोनीसियन (क्वाकियुटल, डोबू – अतिवादी) संस्कृतियाँ; द क्रिसैन्थमम एंड द स्वॉर्ड (जापान) |
| मार्गरेट मीड | कमिंग ऑफ़ एज इन समोआ (1928); सेक्स एंड टेम्परामेंट इन थ्री प्रिमिटिव सोसाइटीज़ (1935) – अरापेश, मुंडुगुमोर, त्चाम्बुली। दिखाया कि लैंगिक भूमिकाएँ सांस्कृतिक हैं, जैविक नहीं। |
| अब्राम कार्डिनर और राल्फ़ लिंटन | मूल व्यक्तित्व संरचना |
| कोरा डु बोइस | बहुलक (मोडल) व्यक्तित्व – द पीपल ऑफ़ अलोर (1944) |
| सिगमंड फ्रायड | इदं (Id), अहं (Ego), पराहं (Superego) |
8.4 समाजीकरण
- वह प्रक्रिया जिसके द्वारा व्यक्ति समाज के मानदंड, मूल्य और भूमिकाएँ सीखकर एक सामाजिक प्राणी बनता है।
- प्रकार: प्राथमिक (परिवार, प्रारंभिक बचपन), द्वितीयक (विद्यालय, मित्र-समूह, कार्यस्थल), प्रत्याशित समाजीकरण (मर्टन – उस समूह की भूमिकाएँ सीखना जिसमें व्यक्ति शामिल होना चाहता है), पुनः समाजीकरण (जेल, सेना, मानसिक अस्पताल जैसी सम्पूर्ण संस्थाओं में – गॉफ़मैन), वयस्क समाजीकरण।
- अभिकरण: परिवार (सबसे महत्वपूर्ण), मित्र-समूह, विद्यालय, धर्म, जनसंचार माध्यम, राज्य, कार्यस्थल।
- सिद्धांत:
| विचारक | सिद्धांत |
| सी.एच. कूले | आत्म-दर्पण सिद्धांत |
| जी.एच. मीड | "मैं" और "मुझे"; खेल और क्रीड़ा की अवस्थाएँ; सामान्यीकृत अन्य |
| सिगमंड फ्रायड | इदं (सुख का सिद्धांत), अहं (वास्तविकता का सिद्धांत), पराहं (अंतरात्मा); मनोलैंगिक अवस्थाएँ |
| जीन पियाजे | संज्ञानात्मक अवस्थाएँ: संवेदी-गामक (0–2) → पूर्व-संक्रियात्मक (2–7) → मूर्त संक्रियात्मक (7–11) → औपचारिक संक्रियात्मक (11+) |
| एरिक एरिक्सन | 8 मनोसामाजिक अवस्थाएँ (विश्वास बनाम अविश्वास आदि) |
| दुर्खीम | शिक्षा "युवा पीढ़ी का व्यवस्थित समाजीकरण" है |
- जंगली / एकाकी बच्चे समाजीकरण का महत्व दिखाते हैं: कमला और अमला (भेड़िया-बालिकाएँ, मिदनापुर, बंगाल, 1920), अन्ना और इज़ाबेल (अमेरिका), रामू (लखनऊ, 1954)।
8.5 सामाजिक नियंत्रण
- ई.ए. रॉस ने अपनी पुस्तक सोशल कंट्रोल (1901) में पहली बार इस शब्द का व्यवस्थित प्रयोग किया।
- परिभाषा (मैकाइवर एवं पेज): "वह तरीका जिससे पूरी सामाजिक व्यवस्था संगठित रहती है और स्वयं को बनाए रखती है।"
- प्रकार:
- औपचारिक (कानून, पुलिस, न्यायालय, राज्य, शिक्षा के नियम) बनाम अनौपचारिक (जनरीतियाँ, लोकाचार, प्रथाएँ, धर्म, जनमत, निंदा, उपहास)।
- कार्ल मैनहाइम: प्रत्यक्ष बनाम अप्रत्यक्ष नियंत्रण।
- किम्बल यंग: सकारात्मक (पुरस्कार) बनाम नकारात्मक (दंड)।
- गुरविच और अन्य: संगठित, असंगठित, स्वतःस्फूर्त।
- समनर: जनरीतियाँ (Folkways) व्यवहार के प्रचलित तरीके हैं, और इनके उल्लंघन पर हल्की नापसंदगी होती है। लोकाचार (Mores) वे जनरीतियाँ हैं जिन्हें समूह के कल्याण के लिए आवश्यक माना जाता है, और इनके उल्लंघन पर कड़ा दंड मिलता है। निषेध (Taboo) एक नकारात्मक लोकाचार है।
- अभिकरण: परिवार, धर्म, शिक्षा, कानून, राज्य, जनमत, प्रचार, जनसंचार माध्यम।
8.6 सामाजिक परिवर्तन
- किंग्सले डेविस: "सामाजिक परिवर्तन से हमारा अर्थ केवल उन्हीं परिवर्तनों से है जो सामाजिक संगठन – यानी समाज की संरचना और प्रकार्यों – में होते हैं।"
- मैकाइवर एवं पेज: सामाजिक परिवर्तन सामाजिक संबंधों में परिवर्तन है।
- संबंधित अवधारणाएँ: उद्विकास (क्रमिक, सरल से जटिल), प्रगति (वांछित दिशा में परिवर्तन, जिसमें मूल्य-निर्णय होता है), विकास (नियोजित परिवर्तन), क्रांति (अचानक, आमूल परिवर्तन)।
- कारक: प्रौद्योगिकीय (ऑगबर्न, वेबलेन, मार्क्स), आर्थिक (मार्क्स), जनसांख्यिकीय, जैविक, सांस्कृतिक (वेबर), भौगोलिक (हंटिंगटन), वैचारिक, कानूनी, शैक्षिक, और महान व्यक्तियों का प्रभाव।
- सामाजिक परिवर्तन के सिद्धांतों के लिए इकाई 4.3 देखें।
आगे: भाग 2 में इकाई 9–15 (भारतीय समाज) और सामान्य अध्ययन के महत्वपूर्ण तथ्य हैं। हर इकाई के बाद मास्टर तालिका और मॉक फ़ाइल से स्वयं को जाँचें।