UPESSC पीजीटी समाजशास्त्र – अध्ययन सामग्री
भाग 1: इकाई 1–8 (आधार, विचारक, सिद्धांत, संस्थाएँ)

भाषा: हिन्दी · हाइलाइट किए गए तथ्य परीक्षा में बार-बार पूछे जाते हैं।

विषय-सूची
  1. इकाई 1 – समाजशास्त्र का अर्थ और क्षेत्र
  2. इकाई 2 – पाश्चात्य समाजशास्त्रीय विचारक
  3. इकाई 3 – भारतीय समाजशास्त्रीय विचारक
  4. इकाई 4 – समाजशास्त्रीय सिद्धांत
  5. इकाई 5 – सामाजिक संस्थाएँ
  6. इकाई 6 – सामाजिक प्रक्रियाएँ
  7. इकाई 7 – मूल अवधारणाएँ और स्तरीकरण
  8. इकाई 8 – पर्यावरण, संस्कृति, समाजीकरण, नियंत्रण, परिवर्तन

इकाई 1 – समाजशास्त्र का अर्थ, उत्पत्ति और विषय-क्षेत्र

1.1 अर्थ और उत्पत्ति

1.2 प्रमुख परिभाषाएँ

विचारकपरिभाषा
मैक्स वेबर"समाजशास्त्र वह विज्ञान है जो सामाजिक क्रिया का व्याख्यात्मक बोध करने का प्रयास करता है, ताकि उसकी गति और परिणामों की कार्य-कारण व्याख्या की जा सके।"
एमिल दुर्खीमसमाजशास्त्र सामाजिक संस्थाओं का विज्ञान है; इसकी विषय-वस्तु सामाजिक तथ्य हैं।
मैकाइवर एवं पेज"समाजशास्त्र सामाजिक संबंधों के विषय में है, संबंधों के उस जाल को हम समाज कहते हैं।"
मॉरिस गिंसबर्ग"समाजशास्त्र मानवीय अंतःक्रियाओं और अंतःसंबंधों, उनकी दशाओं और परिणामों का अध्ययन है।"
जॉर्ज सिमेलसमाजशास्त्र सामाजिक अंतःक्रिया के स्वरूपों का अध्ययन करता है।
एफ.एच. गिडिंग्स"समाजशास्त्र समाज का वैज्ञानिक अध्ययन है।"
लेस्टर एफ. वार्ड"समाजशास्त्र समाज या सामाजिक घटनाओं का विज्ञान है।"
किंग्सले डेविस"समाजशास्त्र समाज का एक सामान्य विज्ञान है।"

1.3 विषय-क्षेत्र – दो सम्प्रदाय

स्वरूपात्मक / विशिष्टवादी सम्प्रदायसमन्वयात्मक सम्प्रदाय
समाजशास्त्र को केवल सामाजिक संबंधों के स्वरूपों का अध्ययन करना चाहिए, ताकि यह एक अलग, विशिष्ट विज्ञान बना रहे।
विचारक: जॉर्ज सिमेल, वीरकांत, लियोपोल्ड वॉन वीज़, फर्डिनेंड टॉनीज़, मैक्स वेबर, स्मॉल।
समाजशास्त्र एक सामान्य विज्ञान होना चाहिए जो सभी सामाजिक विज्ञानों का समन्वय करे और पूरे समाज का अध्ययन करे।
विचारक: एमिल दुर्खीम, एल.टी. हॉबहाउस, पी.ए. सोरोकिन, मॉरिस गिंसबर्ग।
आलोचना: स्वरूप को विषय-वस्तु से अलग नहीं किया जा सकता।दुर्खीम ने समाजशास्त्र को तीन भागों में बाँटा: सामाजिक आकारिकी, सामाजिक शरीरक्रियाशास्त्र और सामान्य समाजशास्त्र।

1.4 समाजशास्त्र की प्रकृति (रॉबर्ट बीरस्टीड, द सोशल ऑर्डर)

  1. यह सामाजिक विज्ञान है, प्राकृतिक नहीं
  2. यह निरपेक्ष/वास्तविक (Categorical) विज्ञान है, आदर्शात्मक (Normative) नहीं। यह "क्या है" का अध्ययन करता है, "क्या होना चाहिए" का नहीं।
  3. यह विशुद्ध विज्ञान है, व्यावहारिक नहीं
  4. यह अमूर्त विज्ञान है, मूर्त नहीं
  5. यह सामान्यीकरण करने वाला विज्ञान है, विशेष घटनाओं का नहीं
  6. यह तार्किक और आनुभविक दोनों प्रकार का विज्ञान है
  7. यह सामान्य विज्ञान है, विशेष नहीं

1.5 अन्य सामाजिक विज्ञानों से संबंध

विज्ञानमुख्य बिंदु
मानवशास्त्रक्रोबर ने समाजशास्त्र और मानवशास्त्र को "जुड़वाँ बहनें" कहा। मानवशास्त्र सरल/जनजातीय समाजों का अध्ययन करता है; समाजशास्त्र मुख्यतः जटिल/आधुनिक समाजों का।
इतिहास"इतिहास भूतकालीन समाजशास्त्र है और समाजशास्त्र वर्तमान इतिहास है" (जी.ई. हावर्ड)। इतिहास विशेष घटनाओं का अध्ययन करता है, समाजशास्त्र सामान्यीकरण करता है।
मनोविज्ञानमनोविज्ञान व्यक्ति के मन का अध्ययन करता है, समाजशास्त्र समूहों का। सामाजिक मनोविज्ञान दोनों के बीच का सेतु है।
अर्थशास्त्रअर्थशास्त्र धन, उत्पादन और उपभोग से जुड़ा है। वेबर (प्रोटेस्टेंट नीति) और मार्क्स ने अर्थव्यवस्था को समाज से जोड़ा।
राजनीति विज्ञानराजनीति विज्ञान राज्य और सरकार का अध्ययन करता है; राजनीतिक समाजशास्त्र समाज में शक्ति का।

1.6 भारत में समाजशास्त्र का विकास

1.7 प्रत्यक्षवाद बनाम प्रत्यक्षवाद-विरोध

प्रत्यक्षवाद (Positivism)प्रत्यक्षवाद-विरोध (व्याख्यात्मक उपागम)
प्राकृतिक विज्ञानों की पद्धति अपनाता है; अवलोकन योग्य तथ्यों का अध्ययन करता है; नियमों की खोज करता है। कॉम्ट, दुर्खीम।अर्थ और उद्देश्यों का अध्ययन करता है; बोध (Verstehen) पद्धति अपनाता है। वेबर, डिल्थे, रिकर्ट, शुट्ज़।

इकाई 2 – पाश्चात्य समाजशास्त्रीय विचारक

2.1 ऑगस्ट कॉम्ट (1798–1857), फ्रांस

2.2 हरबर्ट स्पेंसर (1820–1903), इंग्लैंड

2.3 कार्ल मार्क्स (1818–1883), जर्मनी

2.4 एमिल दुर्खीम (1858–1917), फ्रांस

2.5 मैक्स वेबर (1864–1920), जर्मनी

2.6 अन्य विचारक जिनसे प्रश्न आते हैं (अतिरिक्त)

विचारकमुख्य अवधारणाएँ / पुस्तकें
विल्फ्रेडो पैरेटो (इटली)द माइंड एंड सोसाइटी (त्रात्तातो, 1916); अभिजात वर्ग का परिभ्रमण; शेर और लोमड़ी; विशिष्ट चालक (Residues) और भ्रान्त तर्क (Derivations); तार्किक और अतार्किक क्रिया
जॉर्ज सिमेल (जर्मनी)स्वरूपात्मक समाजशास्त्र; द फ़िलॉसफ़ी ऑफ़ मनी (1900); "महानगर और मानसिक जीवन" (1903); अजनबी (The Stranger); द्वयी और त्रयी
फर्डिनेंड टॉनीज़गेमाइनशाफ़्ट और गेसेलशाफ़्ट (1887) – समुदाय बनाम समिति
सी.एच. कूलेह्यूमन नेचर एंड द सोशल ऑर्डर (1902) – आत्म-दर्पण (Looking-glass self); सोशल ऑर्गनाइज़ेशन (1909) – प्राथमिक समूह
डब्ल्यू.जी. समनरफ़ोकवेज़ (1906); जनरीतियाँ, लोकाचार; अंतःसमूह/बाह्यसमूह; स्वजातिकेन्द्रितता
ई.ए. रॉससोशल कंट्रोल (1901)
डब्ल्यू.एफ. ऑगबर्नसोशल चेंज (1922) – सांस्कृतिक विलम्बना; भौतिक और अभौतिक संस्कृति
पी.ए. सोरोकिनसोशल मोबिलिटी (1927); सोशल एंड कल्चरल डायनेमिक्स (1937–41) – इन्द्रियपरक (Sensate), भावात्मक/विचारात्मक (Ideational) और आदर्शवादी (Idealistic) संस्कृतियाँ
टालकट पारसन्सद स्ट्रक्चर ऑफ़ सोशल एक्शन (1937), द सोशल सिस्टम (1951); AGIL; प्रतिमान चर
आर.के. मर्टनसोशल थ्योरी एंड सोशल स्ट्रक्चर (1949); प्रकट/अप्रकट प्रकार्य; मध्य-स्तरीय सिद्धांत; संदर्भ समूह; भूमिका-पुंज; आदर्शशून्यता सिद्धांत
सी. राइट मिल्सद पावर एलीट (1956); द सोशियोलॉजिकल इमैजिनेशन (1959)

इकाई 3 – भारतीय समाजशास्त्रीय विचारक

3.1 जी.एस. घुरिये (गोविन्द सदाशिव घुरिये, 1893–1983)

3.2 राधाकमल मुकर्जी (1889–1968)

राधाकमल मुकर्जी को डी.पी. मुकर्जी (धूर्जटि प्रसाद मुकर्जी) से भ्रमित न करें। डी.पी. मुकर्जी भी लखनऊ से थे। वे परंपरा और आधुनिकता पर मार्क्सवादी/द्वंद्वात्मक दृष्टि रखते थे और उन्होंने मॉडर्न इंडियन कल्चर (1942) और डाइवर्सिटीज़ (1958) लिखीं।

3.3 ए.आर. देसाई (अक्षय रमणलाल देसाई, 1915–1994)

3.4 एस.सी. दुबे (श्यामाचरण दुबे, 1922–1996)

3.5 अन्य भारतीय विचारक (वैकल्पिक सूची और बार-बार पूछे जाने वाले)

विचारकमुख्य कृतियाँ और अवधारणाएँ
एम.एन. श्रीनिवासरिलीजन एंड सोसाइटी अमंग द कुर्गस ऑफ़ साउथ इंडिया (1952) – संस्कृतिकरण; "प्रभु जाति" (1955, रामपुरा गाँव, मैसूर); सोशल चेंज इन मॉडर्न इंडिया (1966) – पश्चिमीकरण, धर्मनिरपेक्षीकरण; द रिमेम्बर्ड विलेज (1976); "वोट बैंक" (शब्द उन्होंने लोकप्रिय किया); "पुस्तकीय दृष्टिकोण बनाम क्षेत्रीय दृष्टिकोण"
श्री अरविंदद ह्यूमन साइकिल; द आइडियल ऑफ़ ह्यूमन यूनिटी; द लाइफ़ डिवाइन। मनोवैज्ञानिक अवस्थाओं से सामाजिक विकास: प्रतीकात्मक → प्रारूपिक → परंपरागत → व्यक्तिवादी → आत्मनिष्ठ (→ आध्यात्मिक युग)। राष्ट्रवाद को आध्यात्मिक माना।
महात्मा गांधीहिन्द स्वराज (1909); सत्याग्रह; सर्वोदय (सबका कल्याण; रस्किन की अन टू दिस लास्ट से प्रेरित); न्यासिता (ट्रस्टीशिप); ग्राम स्वराज; विकेन्द्रीकरण; बुनियादी शिक्षा (नई तालीम, वर्धा 1937); "हरिजन" शब्द
भगवान दासद साइंस ऑफ़ सोशल ऑर्गनाइज़ेशन, ऑर द लॉज़ ऑफ़ मनु इन द लाइट ऑफ़ आत्म-विद्या; द साइंस ऑफ़ पीस; द साइंस ऑफ़ द इमोशन्स। उन्होंने वर्ण और आश्रम को जन्म नहीं, स्वभाव (गुण) पर आधारित एक वैज्ञानिक सामाजिक संगठन के रूप में समझाया। भारत रत्न 1955।
डॉ. बी.आर. आंबेडकरकास्ट्स इन इंडिया: देयर मैकेनिज़्म, जेनेसिस एंड डेवलपमेंट (1916, कोलंबिया) – जाति = एक बंद वर्ग, जो अंतर्विवाह से बनी रहती है; जाति का उन्मूलन (Annihilation of Caste, 1936); शूद्र कौन थे? (1946); द अनटचेबल्स (1948); बुद्ध और उनका धम्म (1957)
डी.एन. मजूमदाररेसेज़ एंड कल्चर्स ऑफ़ इंडिया; कास्ट एंड कम्युनिकेशन इन एन इंडियन विलेज (मोहाना, लखनऊ के पास); हो जनजाति का अध्ययन
इरावती कर्वेकिनशिप ऑर्गनाइज़ेशन इन इंडिया (1953) – नातेदारी के चार क्षेत्र; हिन्दू सोसाइटी: एन इंटरप्रिटेशन
के.एम. कपाड़ियाहिन्दू किनशिप (1947); मैरिज एंड फ़ैमिली इन इंडिया (1955)
पी.एच. प्रभुहिन्दू सोशल ऑर्गनाइज़ेशन
योगेन्द्र सिंहमॉडर्नाइज़ेशन ऑफ़ इंडियन ट्रेडिशन (1973)
आन्द्रे बेतेकास्ट, क्लास एंड पावर (1965, श्रीपुरम गाँव, तंजौर)
लुई ड्यूमों (फ्रांसीसी)होमो हाइरारकिकस (1966) – जाति शुद्धता और अशुद्धता के विरोध पर आधारित
वेरियर एल्विनद बैगा (1939); जनजातीय पृथक्करण की नीति ("राष्ट्रीय उद्यान"); नेफ़ा (NEFA) के सलाहकार
रजनी कोठारीकास्ट इन इंडियन पॉलिटिक्स (1970)

इकाई 4 – समाजशास्त्रीय सिद्धांत

4.1 प्रकार्यवाद (संरचनात्मक-प्रकार्यवाद)

4.2 संघर्ष सिद्धांत

4.3 सामाजिक परिवर्तन के सिद्धांत

प्रकारविचारकमुख्य विचार
उद्विकासीय (रेखीय)कॉम्टतीन अवस्थाओं का नियम
स्पेंसरसरल → जटिल; सैनिक → औद्योगिक
एल.एच. मॉर्गनएन्शिएंट सोसाइटी (1877): जंगली अवस्था → बर्बर अवस्था → सभ्यता
चक्रीयओसवाल्ड स्पेंगलरद डिक्लाइन ऑफ़ द वेस्ट (1918): सभ्यताएँ जीवों की तरह जन्म लेती हैं, बढ़ती हैं, क्षीण होती हैं और मर जाती हैं
आर्नल्ड टॉयनबीए स्टडी ऑफ़ हिस्ट्री: चुनौती और प्रत्युत्तर; सृजनशील अल्पसंख्यक
विल्फ्रेडो पैरेटोअभिजात वर्ग का परिभ्रमण (शेर बनाम लोमड़ी)
पी.ए. सोरोकिनइन्द्रियपरक, विचारात्मक और आदर्शवादी संस्कृतियों के बीच उतार-चढ़ाव ("घड़ी के पेंडुलम" जैसा सिद्धांत)
संघर्ष / द्वंद्वात्मककार्ल मार्क्सवर्ग संघर्ष और उत्पादन प्रणाली के अंतर्विरोधों से परिवर्तन
प्रौद्योगिकीयडब्ल्यू.एफ. ऑगबर्न; थॉर्स्टीन वेबलेनप्रौद्योगिकी पहले बदलती है और भौतिक संस्कृति अभौतिक संस्कृति से तेज़ बदलती है, जिससे सांस्कृतिक विलम्बना पैदा होती है
प्रकार्यात्मक / संतुलनटालकट पारसन्सपरिवर्तन क्रमिक और अनुकूलनशील होता है, "गतिशील संतुलन"; संरचनात्मक विभेदीकरण
प्रसारवादीइलियट स्मिथ, पेरी (ब्रिटिश); बोआस (अमेरिकी)सांस्कृतिक तत्वों के आदान-प्रदान से परिवर्तन फैलता है

4.4 प्रतीकात्मक अंतःक्रियावाद

4.5 घटनाक्रियाशास्त्र (प्रघटनाशास्त्र) और नृजाति पद्धतिशास्त्र

इकाई 5 – प्रमुख सामाजिक संस्थाएँ

5.1 परिवार

आधारप्रकार
संरचनाकेंद्रीय (नाभिकीय), संयुक्त, विस्तृत
वंशपितृवंशीय, मातृवंशीय (खासी, गारो – मेघालय; नायर – केरल), द्विपक्षीय
निवासपितृस्थानीय, मातृस्थानीय, नवस्थानीय, मातुलस्थानीय (मामा के साथ), द्विस्थानीय
सत्तापितृसत्तात्मक, मातृसत्तात्मक
विवाहएकविवाही, बहुविवाही (बहुपत्नी, बहुपति)

5.2 विवाह

5.3 नातेदारी

5.4 धर्म

विचारकधर्म का सिद्धांत
ई.बी. टायलरजीववाद (Animism) – "आध्यात्मिक सत्ताओं में विश्वास"; प्रिमिटिव कल्चर (1871); स्वप्न और आत्मा के विचार से उत्पत्ति
मैक्स मूलरप्रकृतिवाद (Naturism) – प्रकृति की शक्तियों की पूजा
आर.आर. मैरेटजीवित सत्तावाद / मानावाद (Animatism) – एक अवैयक्तिक अलौकिक शक्ति (माना, मेलानेशियाई शब्द, जिसका वर्णन कोडरिंगटन ने किया) में विश्वास
जे.जी. फ्रेज़रद गोल्डन बाउ (1890): जादू → धर्म → विज्ञान का विकास; सहानुभूतिक जादू (अनुकरणात्मक, संसर्गात्मक)
दुर्खीमटोटमवाद; पवित्र बनाम अपवित्र; धर्म = समाज द्वारा स्वयं की पूजा
मैलिनोव्स्कीमैजिक, साइंस एंड रिलीजन; संकट के समय धर्म चिंता कम करता है
मार्क्सधर्म "जनता की अफ़ीम" है; शासक वर्ग की विचारधारा
वेबरधर्म आर्थिक परिवर्तन ला सकता है (प्रोटेस्टेंट नीति)

धर्म के प्रकार्य: सामाजिक एकता, सामाजिक नियंत्रण, जीवन का अर्थ और भावनात्मक सहारा, मानदंडों को वैधता, और सामाजिक परिवर्तन का आधार (जैसे भक्ति आंदोलन, सुधार आंदोलन)।

इकाई 6 – सामाजिक प्रक्रियाएँ

सामाजिक प्रक्रिया = सामाजिक अंतःक्रिया का बार-बार होने वाला स्वरूप। पार्क एवं बर्गेस (इंट्रोडक्शन टू द साइंस ऑफ़ सोशियोलॉजी, 1921) ने चार मुख्य प्रक्रियाएँ बताईं: प्रतिस्पर्धा, संघर्ष, व्यवस्थापन, सात्मीकरण।

सहयोगी (संगठनात्मक / संयोजक)असहयोगी (विघटनात्मक / वियोजक)
सहयोग, व्यवस्थापन (समायोजन), सात्मीकरण, पर-संस्कृतिग्रहणप्रतिस्पर्धा, संघर्ष (और प्रतिकूलता)

6.1 सहयोग

6.2 व्यवस्थापन (समायोजन)

6.3 सात्मीकरण (आत्मसात्करण)

6.4 प्रतिस्पर्धा बनाम संघर्ष

प्रतिस्पर्धासंघर्ष
अवैयक्तिकवैयक्तिक
अचेतनचेतन
निरंतरअनिरंतर (कभी-कभी)
नियमों का पालन; अहिंसकहिंसक हो सकता है; विरोधी को हराना या समाप्त करना उद्देश्य
ध्यान लक्ष्य (दुर्लभ पुरस्कार) परध्यान प्रतिद्वंद्वी पर

संघर्ष के प्रकार (सिमेल और अन्य): व्यक्तिगत, प्रजातीय, वर्ग, राजनीतिक, अंतर्राष्ट्रीय। गिलिन एवं गिलिन ने सामाजिक प्रक्रियाओं को सहयोगी और असहयोगी में बाँटा।

इकाई 7 – मूल अवधारणाएँ और सामाजिक स्तरीकरण

7.1 समाज, समुदाय, समिति, संस्था

अवधारणापरिभाषामुख्य विशेषताएँ
समाजमैकाइवर एवं पेज: "समाज सामाजिक संबंधों का जाल है।"अमूर्त; समानता और भिन्नता; अन्योन्याश्रितता; सहयोग और संघर्ष; गतिशील
समुदायमैकाइवर: "सामाजिक जीवन का वह क्षेत्र जिसमें कुछ अंश तक सामाजिक सम्बद्धता (सामंजस्य) पाई जाती है।"दो आधार: निश्चित भू-भाग (स्थानीयता) + सामुदायिक भावना (हम की भावना, भूमिका की भावना, निर्भरता की भावना)। मूर्त; जान-बूझकर नहीं बनाया जाता। उदाहरण: गाँव, नगर, जनजाति।
समितिमैकाइवर: "किसी हित या हितों की सामूहिक पूर्ति के लिए जान-बूझकर बनाया गया संगठन।"जान-बूझकर बनाई जाती है; एक विशेष उद्देश्य; नियम होते हैं; सदस्यता ऐच्छिक; मूर्त। उदाहरण: विद्यालय, श्रमिक संघ, राजनीतिक दल।
संस्थामैकाइवर एवं पेज: "समूह की गतिविधियों की विशेषता बताने वाली कार्य-प्रणाली के स्थापित स्वरूप या दशाएँ।"अमूर्त; मानदंडों की व्यवस्था; स्थायी; बुनियादी आवश्यकताएँ पूरी करती है। उदाहरण: विवाह, परिवार (एक व्यवस्था के रूप में), संपत्ति, धर्म।
याद रखने की युक्ति: हम समिति के सदस्य होते हैं; संस्था के सदस्य नहीं होते। विद्यालय (भवन और सदस्य) समिति है; शिक्षा संस्था है।

7.2 सामाजिक समूह

वर्गीकरणविचारकविवरण
प्राथमिक और द्वितीयक समूहसी.एच. कूले (सोशल ऑर्गनाइज़ेशन, 1909)प्राथमिक: आमने-सामने के, घनिष्ठ, छोटे, "मानव स्वभाव की पालना" (परिवार, क्रीड़ा समूह, पड़ोस)। द्वितीयक: अवैयक्तिक, बड़े, उद्देश्य-केन्द्रित (यह शब्द बाद में आया)।
अंतःसमूह और बाह्यसमूहडब्ल्यू.जी. समनर (फ़ोकवेज़, 1906)अंतःसमूह: "हम" की भावना; बाह्यसमूह: "वे" की भावना। इससे स्वजातिकेन्द्रितता पैदा होती है।
संदर्भ समूहशब्द हर्बर्ट हाइमन ने गढ़ा (1942); विकास आर.के. मर्टन ने कियावह समूह जिसके मानकों से व्यक्ति स्वयं का मूल्यांकन करता है। "सापेक्षिक वंचना" और "प्रत्याशित समाजीकरण" से जुड़ा।
गेमाइनशाफ़्ट और गेसेलशाफ़्टएफ. टॉनीज़ (1887)समुदाय (स्वाभाविक इच्छा) बनाम समिति (तार्किक इच्छा)
क्षैतिज और ऊर्ध्वाधर समूहसोरोकिन—
अनैच्छिक और ऐच्छिक समूहचार्ल्स ए. एलवुड—

7.3 प्रस्थिति और भूमिका

7.4 सामाजिक स्तरीकरण

सिद्धांतविचारकमुख्य विचार
प्रकार्यवादीकिंग्सले डेविस और विल्बर्ट मूर (1945)स्तरीकरण सार्वभौमिक और आवश्यक है। महत्वपूर्ण पदों के लिए योग्य लोग चाहिए, जिन्हें अधिक पुरस्कार देकर प्रेरित करना होता है। मेल्विन ट्यूमिन (1953) ने इसकी आलोचना की।
मार्क्सवादीकार्ल मार्क्सउत्पादन के साधनों के स्वामित्व पर आधारित दो वर्ग; स्तरीकरण से शोषण और संघर्ष।
वेबरवादी (बहुआयामी)मैक्स वेबरवर्ग, प्रस्थिति, दल।

7.5 सामाजिक गतिशीलता

इकाई 8 – पारिस्थितिक पर्यावरण, संस्कृति और व्यक्तित्व, समाजीकरण, सामाजिक नियंत्रण, सामाजिक परिवर्तन

8.1 पर्यावरण और मानव समाज (मानव पारिस्थितिकी)

8.2 संस्कृति

8.3 संस्कृति और व्यक्तित्व

विचारकयोगदान
रूथ बेनेडिक्टपैटर्न्स ऑफ़ कल्चर (1934): अपोलोनियन (ज़ूनी, शांत) बनाम डायोनीसियन (क्वाकियुटल, डोबू – अतिवादी) संस्कृतियाँ; द क्रिसैन्थमम एंड द स्वॉर्ड (जापान)
मार्गरेट मीडकमिंग ऑफ़ एज इन समोआ (1928); सेक्स एंड टेम्परामेंट इन थ्री प्रिमिटिव सोसाइटीज़ (1935) – अरापेश, मुंडुगुमोर, त्चाम्बुली। दिखाया कि लैंगिक भूमिकाएँ सांस्कृतिक हैं, जैविक नहीं।
अब्राम कार्डिनर और राल्फ़ लिंटनमूल व्यक्तित्व संरचना
कोरा डु बोइसबहुलक (मोडल) व्यक्तित्व – द पीपल ऑफ़ अलोर (1944)
सिगमंड फ्रायडइदं (Id), अहं (Ego), पराहं (Superego)

8.4 समाजीकरण

8.5 सामाजिक नियंत्रण

8.6 सामाजिक परिवर्तन

आगे: भाग 2 में इकाई 9–15 (भारतीय समाज) और सामान्य अध्ययन के महत्वपूर्ण तथ्य हैं। हर इकाई के बाद मास्टर तालिका और मॉक फ़ाइल से स्वयं को जाँचें।