UPESSC पीजीटी समाजशास्त्र – अध्ययन सामग्री
भाग 2: इकाई 9–15 (भारतीय समाज) + सामान्य अध्ययन
भाषा: हिन्दी · हाइलाइट किए गए तथ्य परीक्षा में बार-बार पूछे जाते हैं।
इकाई 9 – हिन्दू सामाजिक संगठन
9.1 वर्ण व्यवस्था
- सबसे प्राचीन उल्लेख ऋग्वेद के 10वें मंडल का पुरुष सूक्त है। ब्राह्मण विराट पुरुष के मुख से, क्षत्रिय भुजाओं से, वैश्य जंघाओं से और शूद्र पैरों से उत्पन्न हुए।
- कर्तव्य (वर्ण धर्म): ब्राह्मण – अध्ययन, अध्यापन, यज्ञ; क्षत्रिय – रक्षा, शासन; वैश्य – व्यापार, कृषि, पशुपालन; शूद्र – अन्य तीनों की सेवा।
- भगवद्गीता के अनुसार वर्ण गुण और कर्म पर आधारित है: "चातुर्वर्ण्यं मया सृष्टं गुणकर्मविभागशः"।
- वर्ण बनाम जाति: वर्ण 4 हैं, पर जातियाँ हज़ारों हैं। वर्ण एक सैद्धांतिक, अखिल भारतीय ढाँचा है; जाति वास्तविक, स्थानीय, जन्म पर आधारित अंतर्विवाही समूह है।
9.2 आश्रम व्यवस्था (जीवन की अवस्थाएँ, कुल 100 वर्ष)
| आश्रम | आयु | कर्तव्य / उद्देश्य |
|---|---|---|
| 1. ब्रह्मचर्य | 0–25 | विद्यार्थी जीवन, ब्रह्मचर्य, गुरुकुल में अध्ययन |
| 2. गृहस्थ | 25–50 | गृहस्थ जीवन; विवाह, परिवार, पंच महायज्ञ; सबसे महत्वपूर्ण माना गया (मनु), क्योंकि यही अन्य तीनों का आधार है |
| 3. वानप्रस्थ | 50–75 | धीरे-धीरे सांसारिक जीवन से अलग होना; वन में निवास; दूसरों का मार्गदर्शन |
| 4. संन्यास | 75–100 | पूर्ण त्याग; मोक्ष की खोज |
पुरुषार्थ–आश्रम संबंध: ब्रह्मचर्य → धर्म; गृहस्थ → अर्थ और काम (धर्म के अनुसार); वानप्रस्थ और संन्यास → मोक्ष।
9.3 धर्म
- "धर्म" शब्द "धृ" धातु (धारण करना) से बना है। धर्म वह है जो समाज को धारण करता है: कर्तव्य, सदाचार, नैतिक नियम।
- प्रकार: सामान्य (साधारण) धर्म – सबके लिए सार्वभौमिक कर्तव्य, जैसे सत्य, अहिंसा, अस्तेय; विशेष धर्म – विशेष कर्तव्य: वर्ण धर्म, आश्रम धर्म, कुल धर्म, राज धर्म, युग धर्म, आपद् धर्म (संकट के समय का धर्म), स्वधर्म।
9.4 पुरुषार्थ (जीवन के चार लक्ष्य)
धर्म → अर्थ → काम → मोक्ष। धर्म (सदाचार) आधार है। अर्थ (धन) और काम (इच्छा, सुख) धर्म की सीमा में रहकर प्राप्त किए जाने चाहिए। मोक्ष (मुक्ति) अंतिम लक्ष्य है।
9.5 ऋण और पंच महायज्ञ
| तीन ऋण | चुकाने का उपाय |
|---|---|
| देव ऋण (देवताओं का) | यज्ञ, पूजा |
| ऋषि ऋण (ऋषियों का) | वेदों का अध्ययन और अध्यापन |
| पितृ ऋण (पूर्वजों का) | संतान (पुत्र) उत्पन्न करना, श्राद्ध |
गृहस्थ के पंच महायज्ञ: ब्रह्म यज्ञ (स्वाध्याय), देव यज्ञ (देवताओं को आहुति), पितृ यज्ञ (पूर्वजों को तर्पण), भूत यज्ञ (पशु-पक्षियों को भोजन), नृ / मनुष्य यज्ञ (अतिथि सत्कार)।
9.6 संस्कार
- जीवन भर किए जाने वाले शुद्धिकारक अनुष्ठान। प्रचलित संख्या 16 (षोडश संस्कार) है। गौतम धर्मसूत्र में 40 और मनु में 13 संस्कार बताए गए हैं।
- 16 संस्कार: (1) गर्भाधान, (2) पुंसवन, (3) सीमन्तोन्नयन, (4) जातकर्म (जन्म), (5) नामकरण, (6) निष्क्रमण (पहली बार घर से बाहर ले जाना), (7) अन्नप्राशन (पहली बार अन्न खिलाना), (8) चूड़ाकरण / मुंडन, (9) कर्णवेध, (10) विद्यारंभ, (11) उपनयन (यज्ञोपवीत – "दूसरा जन्म", इसीलिए "द्विज"), (12) वेदारंभ, (13) केशान्त / गोदान, (14) समावर्तन (शिक्षा पूरी होना), (15) विवाह (सबसे महत्वपूर्ण), (16) अंत्येष्टि (अंतिम संस्कार)।
9.7 कर्म और पुनर्जन्म का सिद्धांत
- हर कर्म का फल मिलता है। व्यक्ति का वर्तमान जन्म, जाति-स्थिति सहित, पिछले कर्मों का फल है। अच्छे कर्म से अच्छा पुनर्जन्म मिलता है।
- समाजशास्त्रीय महत्व: इसने जाति के संस्तरण को वैधता दी और सामाजिक नियंत्रण तथा नैतिक आचरण की प्रेरणा का काम किया। वेबर ने कहा कि कर्म सिद्धांत ने जाति व्यवस्था को स्थिर बनाया।
- कर्म के तीन प्रकार: संचित (एकत्रित), प्रारब्ध (जिसका फल अभी मिल रहा है), क्रियमाण (जो अभी किया जा रहा है)।
9.8 हिन्दू विवाह
- हिन्दू विवाह एक धार्मिक संस्कार है, समझौता नहीं। इसे अविच्छेद्य और जीवन भर का बंधन माना गया है, जो (परंपरागत रूप से) मृत्यु के बाद भी बना रहता है।
- उद्देश्य: धर्म (सर्वोच्च), प्रजा (संतान), रति (सुख, सबसे निम्न)।
- विवाह के आठ प्रकार (मनु):
प्रकार विशेषता स्थिति 1. ब्राह्म विद्वान और चरित्रवान वर को आभूषणों सहित कन्यादान – सर्वश्रेष्ठ प्रकार प्रशस्त (स्वीकृत) 2. दैव यज्ञ कराने वाले पुरोहित को कन्यादान 3. आर्ष वर द्वारा कन्या के पिता को एक गाय और एक बैल का जोड़ा देना 4. प्राजापत्य पिता "तुम दोनों मिलकर धर्म का पालन करो" के आशीर्वाद के साथ कन्यादान करता है 5. आसुर क्रय विवाह (वधू-मूल्य) अप्रशस्त (अस्वीकृत) 6. गान्धर्व पारस्परिक सहमति से प्रेम विवाह 7. राक्षस अपहरण द्वारा विवाह 8. पैशाच सोई हुई, नशे में या मानसिक रूप से अस्वस्थ कन्या से छलपूर्वक विवाह – सबसे निकृष्ट प्रकार - निषेध: अंतर्विवाह (जाति या उपजाति के भीतर) और बहिर्विवाह (गोत्र, प्रवर और सपिंड संबंधियों के बाहर)। परंपरागत सपिंड नियम: पिता की ओर से 7 और माता की ओर से 5 पीढ़ियाँ। हिन्दू विवाह अधिनियम 1955: पिता की ओर से 5 और माता की ओर से 3 पीढ़ियाँ।
- अनुलोम विवाह स्वीकार्य था; प्रतिलोम विवाह अस्वीकृत था।
- कानून: हिन्दू विधवा पुनर्विवाह अधिनियम 1856 (ईश्वरचन्द्र विद्यासागर); बाल विवाह निरोधक अधिनियम 1929 (शारदा एक्ट); विशेष विवाह अधिनियम 1954; हिन्दू विवाह अधिनियम 1955 (एकविवाह अनिवार्य, विवाह-विच्छेद की अनुमति); हिन्दू उत्तराधिकार अधिनियम 1956 (2005 के संशोधन से बेटियों को सहदायिकी में बराबर अधिकार); दहेज निषेध अधिनियम 1961; बाल विवाह प्रतिषेध अधिनियम 2006 (लड़की 18, लड़का 21)।
- परिवर्तन: विवाह-विच्छेद और पुनर्विवाह में वृद्धि, प्रेम और अंतर्जातीय विवाह, विवाह की आयु में वृद्धि, विवाह के धार्मिक स्वरूप में कमी, और दहेज का बने रहना।
9.9 हिन्दू संयुक्त परिवार
- इरावती कर्वे: "संयुक्त परिवार ऐसे लोगों का समूह है जो सामान्यतः एक ही छत के नीचे रहते हैं, एक ही चूल्हे पर बना भोजन करते हैं, सम्मिलित संपत्ति रखते हैं, सामान्य पूजा में भाग लेते हैं और एक-दूसरे से किसी विशेष प्रकार की नातेदारी से संबंधित होते हैं।"
- विशेषताएँ: बड़ा आकार; सामान्य निवास, रसोई, संपत्ति और पूजा; सबसे बड़े पुरुष (कर्ता) की सत्ता; सहकारी अर्थव्यवस्था; तीन या अधिक पीढ़ियाँ; पारस्परिक दायित्व की भावना।
- हिन्दू विधि के दो सम्प्रदाय:
मिताक्षरा दायभाग लेखक: विज्ञानेश्वर लेखक: जीमूतवाहन बंगाल और असम को छोड़कर पूरे भारत में बंगाल और असम पुत्रों को जन्म से ही पैतृक संपत्ति में अधिकार पुत्रों को पिता की मृत्यु के बाद ही अधिकार - प्रकार्य: आर्थिक सुरक्षा, सामाजिक बीमा (वृद्धों, विधवाओं, अनाथों के लिए), समाजीकरण, मनोरंजन, संस्कृति का संरक्षण।
- परिवर्तन या विघटन के कारण: औद्योगीकरण, नगरीकरण, प्रवास, आधुनिक शिक्षा, नए कानून (उत्तराधिकार, विवाह), व्यक्तिवाद, स्त्रियों का रोज़गार, मुद्रा अर्थव्यवस्था।
- कपाड़िया, आई.पी. देसाई और ए.एम. शाह जैसे समाजशास्त्रियों ने पाया कि संयुक्त गृहस्थी भले घट रही हो, "संयुक्तता" (प्रकार्यात्मक संबंध और दायित्व) बनी हुई है।
इकाई 10 – मुस्लिम विवाह और परिवार
- मुस्लिम विवाह (निकाह) एक सामाजिक/दीवानी समझौता (Civil Contract) है, धार्मिक संस्कार नहीं। इसके उद्देश्य हैं यौन संबंधों को वैधता देना, संतानोत्पत्ति और सामाजिक जीवन का नियमन।
- वैध निकाह की आवश्यक शर्तें:
- एक ही बैठक में इजाब (प्रस्ताव) और कुबूल (स्वीकृति)
- योग्यता: स्वस्थ मस्तिष्क और यौवनारंभ (बालिग़ होना)
- दोनों पक्षों की स्वतंत्र सहमति
- गवाह: सुन्नी – दो वयस्क पुरुष, या एक पुरुष और दो स्त्रियाँ; शिया – गवाह आवश्यक नहीं
- मेहर – वह धन या संपत्ति जो पति को पत्नी को देनी होती है; यह पत्नी का अनन्य अधिकार है
- कोई निषिद्ध संबंध न हो (रक्त संबंध, विवाह संबंध, दूध का रिश्ता)
- विवाह के प्रकार:
प्रकार अर्थ सहीह वैध – सभी शर्तें पूरी करता है बातिल शून्य – स्थायी निषेध वाला (जैसे निकट रक्त संबंधी से विवाह) फ़ासिद अनियमित – अस्थायी दोष वाला (जैसे गवाह न होना, पाँचवीं पत्नी, इद्दत के दौरान विवाह); दोष दूर किया जा सकता है मुता निश्चित अवधि और निश्चित मेहर वाला अस्थायी विवाह – केवल इस्ना अशरी शिया में मान्य - मेहर: तुरंत देय (मुअज्जल) – माँगने पर देय; स्थगित (मुवज्जल) – तलाक या मृत्यु पर देय। निश्चित (मेहर-उल-मुसम्मा) बनाम उचित (मेहर-उल-मिस्ल) – प्रथा के अनुसार तय।
- बहुपत्नी विवाह: मुस्लिम पुरुष एक समय में 4 पत्नियाँ तक रख सकता है, बशर्ते सबके साथ समान व्यवहार करे। बहुपति विवाह की अनुमति नहीं है।
- इद्दत (स्त्री के पुनर्विवाह से पहले प्रतीक्षा अवधि): तलाक के बाद 3 मासिक धर्म चक्र (लगभग 3 महीने); पति की मृत्यु के बाद 4 महीने 10 दिन; गर्भवती होने पर प्रसव तक।
- अधिमान्य विवाह: चचेरी बहन (पिता के भाई की बेटी) से विवाह प्रचलित है।
10.1 मुस्लिम विवाह का विच्छेद
| पति द्वारा | पत्नी द्वारा / पारस्परिक | न्यायिक |
|---|---|---|
| तलाक़-ए-अहसन (सबसे उचित: तुहर के दौरान एक बार उच्चारण, फिर इद्दत में संयम) तलाक़-ए-हसन (लगातार तीन तुहर में तीन उच्चारण) तलाक़-उल-बिद्दत (तत्काल तीन तलाक) इला (4 महीने संयम की शपथ) ज़िहार (पत्नी की तुलना किसी निषिद्ध संबंधी से करना) | तलाक़-ए-तफ़वीज़ (पत्नी को सौंपा गया तलाक का अधिकार) ख़ुला – पत्नी पहल करती है और बदले में कुछ देती है (अक्सर मेहर) मुबारत – पारस्परिक सहमति से | मुस्लिम विवाह विच्छेद अधिनियम, 1939 – पत्नी के न्यायालय से तलाक माँगने के आधार (पति 4 वर्ष से लापता, 2 वर्ष से भरण-पोषण नहीं, क्रूरता आदि) |
- शायरा बानो बनाम भारत संघ (22 अगस्त 2017): सर्वोच्च न्यायालय ने तत्काल तीन तलाक (तलाक़-उल-बिद्दत) को असंवैधानिक घोषित किया। मुस्लिम महिला (विवाह अधिकार संरक्षण) अधिनियम, 2019 ने इसे शून्य और दंडनीय अपराध बनाया (3 वर्ष तक कारावास)।
- शाहबानो मामला (1985) भरण-पोषण से जुड़ा था, जिसके बाद मुस्लिम महिला (तलाक पर अधिकार संरक्षण) अधिनियम, 1986 आया।
- मुस्लिम व्यक्तिगत कानून (शरीयत) अनुप्रयोग अधिनियम, 1937।
- मुस्लिम परिवार: परंपरागत रूप से पितृसत्तात्मक और पितृवंशीय, विस्तृत परिवार संरचना वाला। स्त्रियों को उत्तराधिकार में हिस्सा मिलता है (सामान्यतः पुत्र का आधा)। परिवर्तन: शिक्षा, महिला अधिकार, कानूनी सुधार।
इकाई 11 – जाति व्यवस्था, जाति और वर्ग, ग्रामीण शक्ति संरचना
11.1 जाति की परिभाषाएँ
| विचारक | परिभाषा |
|---|---|
| एस.वी. केतकर (हिस्ट्री ऑफ़ कास्ट इन इंडिया, 1909) | "जाति दो विशेषताओं वाला सामाजिक समूह है: (1) सदस्यता केवल उन्हीं तक सीमित है जो सदस्यों से जन्मे हैं, और (2) सदस्यों को एक कठोर सामाजिक नियम द्वारा समूह से बाहर विवाह करने से रोका जाता है।" |
| एच.एच. रिज़ले | "जाति परिवारों या परिवार-समूहों का संकलन है, जिनका एक सामान्य नाम होता है... जो एक सामान्य पूर्वज से उत्पत्ति का दावा करते हैं... एक ही पैतृक व्यवसाय करते हैं... और एक सजातीय समुदाय बनाते हैं।" |
| सी.एच. कूले | "जब एक वर्ग पूर्णतः वंशानुगत हो जाता है, तो हम उसे जाति कहते हैं।" |
| मजूमदार एवं मदान | "जाति एक बंद वर्ग है।" |
| आंबेडकर | जाति एक "परिबद्ध (बंद) वर्ग" है; अंतर्विवाह जाति का सार है। |
| घुरिये | जाति की परिभाषा नहीं दी, बल्कि छः विशेषताएँ बताईं (भाग 1, इकाई 3 देखें)। |
11.2 जाति की उत्पत्ति के सिद्धांत
| सिद्धांत | विचारक | मुख्य विचार |
|---|---|---|
| परंपरागत / दैवी | ऋग्वेद (पुरुष सूक्त), मनु | ईश्वर ने विराट पुरुष के शरीर से रचना की |
| प्रजातीय | एच.एच. रिज़ले (द पीपल ऑफ़ इंडिया, 1908), आंशिक रूप से घुरिये | आर्यों और अनार्यों के बीच संघर्ष और संपर्क; त्वचा का रंग; रिज़ले ने नासिका सूचकांक का प्रयोग किया |
| राजनीतिक | अबे डुबॉय, आंशिक रूप से घुरिये | ब्राह्मणों द्वारा अपनी सर्वोच्चता बनाए रखने की चतुर युक्ति |
| व्यावसायिक | नेसफ़ील्ड, डेन्ज़िल इबेट्सन | "केवल और केवल प्रकार्य" – व्यवसाय ही जाति का आधार है |
| धार्मिक | ए.एम. होकार्ट, सेनार्ट | यज्ञ में अनुष्ठानिक भूमिकाएँ; भोजन संबंधी निषेध; पूर्वज पूजा |
| माना सिद्धांत | जे.एच. हट्टन (कास्ट इन इंडिया, 1946) | माना (अवैयक्तिक शक्ति) और निषेध (टैबू) में जनजातीय विश्वास से प्रतिबंध पैदा हुए |
| उद्विकासीय | अनेक समाजशास्त्री | जाति लंबे समय में अनेक कारकों से विकसित हुई |
जे.एच. हट्टन 1931 की जनगणना के जनगणना आयुक्त थे। यह 2011 की SECC तक सभी जातियों की गणना करने वाली अंतिम जनगणना थी।
11.3 जजमानी व्यवस्था
- विलियम एच. वाइज़र, द हिन्दू जजमानी सिस्टम (1936), करीमपुर गाँव, मैनपुरी जिला (उ.प्र.) का अध्ययन।
- गाँव की जातियों के बीच सेवाओं का वंशानुगत आदान-प्रदान। जजमान = संरक्षक (भूस्वामी जाति) जो सेवाएँ लेता है; कमीन / पुरजन / प्रजा = सेवा देने वाली जातियाँ (नाई, धोबी, कुम्हार, बढ़ई), जिन्हें फ़सल पर अनाज के रूप में भुगतान मिलता है।
- विशेषताएँ: वंशानुगत, स्थायी, वस्तु-विनिमय पर आधारित। इससे प्रकार्यात्मक अन्योन्याश्रितता बनी, पर शोषण भी हुआ। मुद्रा अर्थव्यवस्था, बाज़ार, प्रवास और शिक्षा के कारण इसका पतन हुआ।
11.4 प्रभु जाति (एम.एन. श्रीनिवास)
- कोई जाति तब प्रभु जाति होती है जब उसके पास: (1) संख्यात्मक शक्ति, (2) आर्थिक शक्ति (भू-स्वामित्व), (3) राजनीतिक शक्ति, (4) उच्च अनुष्ठानिक स्थिति, (5) पाश्चात्य शिक्षा और नौकरियाँ हों।
- उदाहरण: जाट (पश्चिमी उ.प्र., हरियाणा), यादव, कुर्मी, लिंगायत और वोक्कालिगा (कर्नाटक), मराठा (महाराष्ट्र), रेड्डी और कम्मा (आंध्र प्रदेश)।
11.5 जाति व्यवस्था में परिवर्तन
- खान-पान और अनुष्ठानिक अपवित्रता के नियमों में ढील; व्यावसायिक गतिशीलता; जजमानी और जाति पंचायत का कमज़ोर होना।
- जाति संघों का उदय और राजनीति में जाति का प्रयोग – रजनी कोठारी, कास्ट इन इंडियन पॉलिटिक्स (1970); रुडोल्फ़ और रुडोल्फ़, द मॉडर्निटी ऑफ़ ट्रेडिशन (1967)।
- संस्कृतिकरण, पश्चिमीकरण, आरक्षण, कानूनी समानता (अनुच्छेद 14–17), नगरीकरण।
- विवाह (अंतर्विवाह) और राजनीति ("वोट बैंक") में जाति आज भी मज़बूत है।
11.6 जाति बनाम वर्ग
| जाति | वर्ग |
|---|---|
| बंद व्यवस्था; सदस्यता जन्म से | खुली व्यवस्था; सदस्यता उपलब्धि से |
| अंतर्विवाह अनिवार्य | विवाह पर कोई प्रतिबंध नहीं |
| धार्मिक आधार (शुद्धता–अशुद्धता, कर्म) | आर्थिक आधार (धन, आय, व्यवसाय) |
| निश्चित वंशानुगत व्यवसाय | व्यवसाय का स्वतंत्र चुनाव |
| बहुत कम गतिशीलता | अधिक गतिशीलता |
| मुख्यतः भारत में | सार्वभौमिक, विशेषकर औद्योगिक समाजों में |
आज जाति और वर्ग एक-दूसरे पर छाए हुए हैं। "जाति से वर्ग की ओर" एक प्रवृत्ति है, पर जातियों के भीतर भी वर्ग हैं ("क्रीमी लेयर")।
11.7 ग्रामीण शक्ति संरचना और उभरता नेतृत्व
- परंपरागत शक्ति संरचना: जाति (अनुष्ठानिक स्थिति), भू-स्वामित्व और आयु पर आधारित। संस्थाएँ: जाति पंचायत, गाँव के बुज़ुर्ग, ज़मींदार, प्रभु जाति।
- स्वतंत्रता के बाद के परिवर्तन: ज़मींदारी उन्मूलन, वयस्क मताधिकार, पंचायती राज (73वाँ संशोधन), पंचायतों में SC/ST/OBC और महिलाओं के लिए आरक्षण, राजनीतिक दल, सहकारी समितियाँ, शिक्षा।
- उभरता नेतृत्व: युवा, शिक्षित और राजनीतिक रूप से जुड़े नेता, अक्सर मध्यम और निम्न जातियों से। नेतृत्व अब प्रदत्त नहीं, अर्जित गुणों पर आधारित है। SC और महिला नेताओं का उदय (जिसमें "प्रधान पति" जैसी परोक्ष व्यवस्था एक चुनौती है), और किसान नेताओं का उदय (जैसे पश्चिमी उ.प्र. के भारतीय किसान यूनियन के महेन्द्र सिंह टिकैत)।
- अध्ययन: आन्द्रे बेते (जाति, वर्ग और शक्ति – श्रीपुरम), योगेन्द्र सिंह, रुडोल्फ़ दंपति, ओमेन, और एफ.जी. बेली (कास्ट एंड द इकोनॉमिक फ़्रंटियर, ओडिशा)।
इकाई 12 – ग्रामीण परिवर्तन और विकास
12.1 ग्रामीण पुनर्निर्माण के प्रारंभिक प्रयोग
| प्रयोग | व्यक्ति / वर्ष |
|---|---|
| श्रीनिकेतन (बंगाल) | रवीन्द्रनाथ टैगोर, 1921–22 |
| गुड़गाँव प्रयोग | एफ.एल. ब्रेन, 1920 |
| मार्तण्डम (त्रावणकोर) | स्पेंसर हैच (YMCA), 1921 |
| बड़ौदा | वी.टी. कृष्णामाचारी, 1932 |
| फ़िरका विकास (मद्रास) | 1946 |
| इटावा पायलट परियोजना (उ.प्र.) | अल्बर्ट मेयर, 1948 – सामुदायिक विकास कार्यक्रम का आदर्श |
| नीलोखेड़ी (हरियाणा) | एस.के. डे, 1948 |
12.2 सामुदायिक विकास कार्यक्रम (CDP)
- 2 अक्टूबर 1952 को 55 परियोजनाओं के साथ शुरू हुआ, फ़ोर्ड फ़ाउंडेशन की सहायता से। उद्देश्य था जन-भागीदारी से गाँवों का सर्वांगीण विकास।
- विकास की इकाई विकास खंड (ब्लॉक) था (लगभग 100 गाँव), जिसके प्रमुख खंड विकास अधिकारी (BDO) थे। ग्राम सेवक (VLW) सरकार और ग्रामीणों के बीच की कड़ी था।
- राष्ट्रीय प्रसार सेवा (NES) 1953 में शुरू हुई।
- मूल्यांकन: यह मुख्यतः सरकारी कार्यक्रम बनकर रह गया, जिसमें जन-भागीदारी कम रही और धनी किसानों को अधिक लाभ हुआ (जैसा एस.सी. दुबे और ए.आर. देसाई ने बताया)।
- बलवंत राय मेहता समिति (1957) ने CDP की समीक्षा की और "लोकतांत्रिक विकेन्द्रीकरण" की सिफ़ारिश की, जिससे पंचायती राज आया।
12.3 पंचायती राज
| घटना | विवरण |
|---|---|
| अनुच्छेद 40 (नीति निदेशक तत्व) | राज्य ग्राम पंचायतों का गठन करेगा |
| बलवंत राय मेहता समिति (1957) | त्रिस्तरीय व्यवस्था: ग्राम पंचायत (गाँव), पंचायत समिति / क्षेत्र पंचायत (खंड), जिला परिषद (जिला) |
| पहला पंचायती राज | नागौर, राजस्थान – 2 अक्टूबर 1959 (नेहरू द्वारा उद्घाटन); आंध्र प्रदेश दूसरा राज्य था |
| अशोक मेहता समिति (1977–78) | द्विस्तरीय व्यवस्था की सिफ़ारिश (जिला परिषद और मंडल पंचायत) |
| जी.वी.के. राव समिति (1985) | नियोजन की मुख्य इकाई जिला |
| एल.एम. सिंघवी समिति (1986) | पंचायतों को संवैधानिक दर्जा देने की सिफ़ारिश |
| 73वाँ संविधान संशोधन अधिनियम, 1992 | 24 अप्रैल 1993 से लागू (राष्ट्रीय पंचायती राज दिवस)। भाग IX (अनुच्छेद 243 से 243-ण) और 11वीं अनुसूची (29 विषय) जोड़ी गई |
| 74वाँ संशोधन अधिनियम, 1992 | नगरीय स्थानीय निकाय; भाग IX-क (243-त से 243-यछ); 12वीं अनुसूची (18 विषय); 1 जून 1993 से लागू |
| पेसा (PESA) अधिनियम 1996 | पंचायत (अनुसूचित क्षेत्रों पर विस्तार) अधिनियम – पाँचवीं अनुसूची के जनजातीय क्षेत्रों तक पंचायती राज का विस्तार |
73वें संशोधन के मुख्य प्रावधान: हर गाँव में ग्राम सभा (243क); त्रिस्तरीय संरचना (20 लाख से अधिक जनसंख्या वाले राज्यों में); प्रत्यक्ष चुनाव; जनसंख्या के अनुपात में SC/ST के लिए सीटों का आरक्षण (243घ); कम से कम एक-तिहाई सीटें महिलाओं के लिए (अब कई राज्य 50% देते हैं); 5 वर्ष का कार्यकाल, भंग होने पर 6 महीने में चुनाव; राज्य निर्वाचन आयोग (243ट); हर 5 वर्ष में राज्य वित्त आयोग (243-झ); न्यूनतम आयु 21 वर्ष।
12.4 भूमि सुधार
- उद्देश्य: बिचौलियों को हटाना, "जोतने वाले को ज़मीन" देना, असमानता घटाना, उत्पादकता बढ़ाना।
- घटक:
- बिचौलियों (ज़मींदारी) का उन्मूलन: उ.प्र. ज़मींदारी उन्मूलन एवं भूमि सुधार अधिनियम, 1950 (1 जुलाई 1952 से लागू) – एक ऐतिहासिक कानून।
- काश्तकारी सुधार – लगान का नियमन, काश्त की सुरक्षा, काश्तकारों को स्वामित्व अधिकार। ऑपरेशन बरगा (पश्चिम बंगाल, 1978) में बटाईदारों का पंजीकरण।
- भू-जोत की अधिकतम सीमा (सीलिंग) – उ.प्र. अधिकतम जोत सीमा आरोपण अधिनियम, 1960; अतिरिक्त भूमि भूमिहीनों में बाँटी गई।
- चकबंदी – उ.प्र. जोत चकबंदी अधिनियम, 1953।
- भूदान आंदोलन – आचार्य विनोबा भावे, 18 अप्रैल 1951 को पोचमपल्ली (तेलंगाना) से शुरू; बाद में ग्रामदान।
- सीमाएँ: बेनामी हस्तांतरण, कानूनी छिद्र, कमज़ोर क्रियान्वयन, धनी किसानों का प्रभाव।
12.5 हरित क्रांति
- यह शब्द विलियम गॉड (USAID) ने 1968 में गढ़ा। विश्व स्तर पर जनक नॉर्मन बोरलॉग (नोबेल शांति पुरस्कार 1970); भारत में जनक एम.एस. स्वामीनाथन। सी. सुब्रमण्यम तत्कालीन कृषि मंत्री थे।
- यह 1960 के दशक के मध्य (1966–67) में अधिक उपज देने वाली किस्मों (HYV) के बीज कार्यक्रम से शुरू हुई, विशेषकर गेहूँ के लिए (बाद में धान)।
- पैकेज: HYV बीज + रासायनिक उर्वरक + सिंचाई + कीटनाशक + यंत्रीकरण + ऋण + न्यूनतम समर्थन मूल्य।
- मुख्य क्षेत्र: पंजाब, हरियाणा, पश्चिमी उ.प्र.
- सकारात्मक प्रभाव: खाद्यान्न में आत्मनिर्भरता, उत्पादन और कृषि आय में वृद्धि, अकाल-निर्भरता (PL-480) का अंत।
- सामाजिक प्रभाव (बार-बार पूछे जाते हैं):
- क्षेत्रीय असमानता (केवल सिंचित क्षेत्रों को लाभ) और वर्ग असमानता (धनी किसानों को अधिक लाभ) में वृद्धि
- पूँजीवादी किसानों और "बैल पूँजीपतियों" (रुडोल्फ़) का उदय; काश्तकारों की बेदखली
- जजमानी व्यवस्था का पतन; नकद मज़दूरी; श्रमिकों का प्रवास (जैसे बिहार और पूर्वी उ.प्र. से पंजाब)
- किसान आंदोलनों का उदय – भारतीय किसान यूनियन (महेन्द्र सिंह टिकैत, पश्चिमी उ.प्र.), शेतकरी संगठन (शरद जोशी, महाराष्ट्र)
- पर्यावरणीय समस्याएँ: मिट्टी का क्षरण, भूजल स्तर में गिरावट, कीटनाशकों के अवशेष
12.6 समन्वित ग्रामीण विकास कार्यक्रम (IRDP)
- 1978–79 में 2,300 विकास खंडों में शुरू; 2 अक्टूबर 1980 से सभी खंडों में लागू।
- उद्देश्य: ग्रामीण गरीबी रेखा से नीचे (BPL) के परिवारों को स्वरोज़गार के माध्यम से गरीबी रेखा से ऊपर उठाना, उत्पादक परिसंपत्तियाँ अनुदान + बैंक ऋण के रूप में देकर।
- लक्षित समूह: लघु और सीमांत किसान, खेतिहर मज़दूर, ग्रामीण कारीगर। कम से कम 50% SC/ST, 40% महिलाएँ और 3% दिव्यांगजन।
- उप-कार्यक्रम: ट्राइसेम (TRYSEM) (स्वरोज़गार के लिए ग्रामीण युवाओं का प्रशिक्षण, 1979) और ड्वाकरा (DWCRA) (ग्रामीण क्षेत्रों में महिला एवं बाल विकास, 1982)।
- 1 अप्रैल 1999 को स्वर्णजयंती ग्राम स्वरोज़गार योजना (SGSY) में विलय → जो राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन (NRLM – आजीविका), 2011 बनी → दीनदयाल अंत्योदय योजना–NRLM।
- अन्य ग्रामीण योजनाएँ: मनरेगा (अधिनियम 2005; 2 फ़रवरी 2006 से शुरू – 100 दिन का मज़दूरी रोज़गार), प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना (2000), प्रधानमंत्री आवास योजना – ग्रामीण (2016), स्वच्छ भारत मिशन (2 अक्टूबर 2014), जल जीवन मिशन (2019)।
इकाई 13 – भारतीय समाज में परिवर्तन
13.1 संस्कृतिकरण
- यह अवधारणा एम.एन. श्रीनिवास ने रिलीजन एंड सोसाइटी अमंग द कुर्गस ऑफ़ साउथ इंडिया (1952) में दी। पहले उन्होंने इसे "ब्राह्मणीकरण" कहा था।
- परिभाषा (1966): "संस्कृतिकरण वह प्रक्रिया है जिसके द्वारा कोई 'निम्न' हिन्दू जाति, या कोई जनजाति अथवा अन्य समूह, किसी उच्च और प्रायः 'द्विज' जाति की दिशा में अपने रीति-रिवाज, कर्मकांड, विचारधारा और जीवन-शैली को बदलता है।"
- आदर्श (मॉडल): ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, और स्थानीय प्रभु जाति।
- उदाहरण: मांस और शराब छोड़ना, जनेऊ पहनना, विधवा पुनर्विवाह पर रोक, संस्कृत कर्मकांड और देवताओं को अपनाना।
- इससे स्थितिगत परिवर्तन होता है, संरचनात्मक परिवर्तन नहीं। जाति व्यवस्था स्वयं नहीं बदलती।
- वि-संस्कृतिकरण का अर्थ है संस्कृत मानदंडों से दूर जाना (जैसे तमिलनाडु के ब्राह्मण-विरोधी आंदोलन में)।
13.2 पश्चिमीकरण
- श्रीनिवास (सोशल चेंज इन मॉडर्न इंडिया, 1966): "150 वर्षों से अधिक के ब्रिटिश शासन के परिणामस्वरूप भारतीय समाज और संस्कृति में आए परिवर्तन; यह शब्द विभिन्न स्तरों – प्रौद्योगिकी, संस्थाओं, विचारधारा और मूल्यों – पर हुए परिवर्तनों को समेटता है।"
- उदाहरण: अंग्रेज़ी शिक्षा, विधि व्यवस्था, रेलवे, प्रेस, वेशभूषा, खान-पान, मानवतावाद, समतावाद और सुधार।
- पश्चिमीकरण नैतिक रूप से तटस्थ है (श्रीनिवास), जबकि आधुनिकीकरण में "अच्छे" या "तार्किक" होने का भाव निहित है।
13.3 सार्वभौमिकरण और स्थानीयकरण
- मैकिम मैरियट ने किशनगढ़ी गाँव (अलीगढ़, उ.प्र.) के अध्ययन के आधार पर यह अवधारणा दी, विलेज इंडिया (1955) के लेख "लिटिल कम्युनिटीज़ इन एन इंडिजिनस सिविलाइज़ेशन" में।
- उन्होंने रॉबर्ट रेडफ़ील्ड की वृहत परंपरा (शास्त्रीय, लिखित, अभिजात, संस्कृत) बनाम लघु परंपरा (लोक, स्थानीय, मौखिक) की अवधारणा का प्रयोग किया – पीज़ेंट सोसाइटी एंड कल्चर (1956)। मिल्टन सिंगर ने इसे मद्रास के अध्ययन में लागू किया।
- सार्वभौमिकरण: लघु परंपरा के तत्व ऊपर उठकर वृहत परंपरा में शामिल हो जाते हैं। स्थानीयकरण (Parochialisation): वृहत परंपरा के तत्व नीचे आकर स्थानीय रूप ले लेते हैं।
- स्थानीयकरण का उदाहरण: लक्ष्मी जैसे संस्कृत देवताओं की स्थानीय रूप में पूजा। सार्वभौमिकरण का उदाहरण: स्थानीय त्योहारों या देवताओं को संस्कृत नाम और ग्रंथ मिल जाना।
13.4 आधुनिकीकरण
- परंपरागत से तार्किक, वैज्ञानिक, धर्मनिरपेक्ष, औद्योगिक और लोकतांत्रिक मूल्यों और संस्थाओं की ओर परिवर्तन। डेनियल लर्नर ने द पासिंग ऑफ़ ट्रेडिशनल सोसाइटी (1958) लिखी।
- योगेन्द्र सिंह, मॉडर्नाइज़ेशन ऑफ़ इंडियन ट्रेडिशन (1973): सूक्ष्म और वृहत स्तरों पर, संरचना और संस्कृति दोनों में परिवर्तन। आधुनिकता और परंपरा साथ-साथ रह सकती हैं।
- रुडोल्फ़ और रुडोल्फ़: द मॉडर्निटी ऑफ़ ट्रेडिशन (1967)। जाति संघ आधुनिक साधन बन गए।
13.5 औद्योगीकरण और नगरीकरण
- औद्योगीकरण: कृषि और हस्तशिल्प से मशीन-आधारित कारखाना उत्पादन की ओर परिवर्तन। प्रभाव: कारखाना व्यवस्था, प्रवास, केंद्रीय परिवार, श्रमिक वर्ग, श्रमिक संघ, नगरीय मलिन बस्तियाँ, जातिगत व्यवसायों का पतन, धर्मनिरपेक्षीकरण।
- नगरीकरण: नगरीय क्षेत्रों में रहने वाली जनसंख्या के अनुपात में वृद्धि।
- जनगणना 2011: भारत की नगरीय जनसंख्या 31.16% (37.7 करोड़)। उ.प्र.: 22.27%।
- जनगणना नगर के मानदंड: कम से कम 5,000 जनसंख्या; कम से कम 75% पुरुष कार्यशील जनसंख्या गैर-कृषि कार्य में; कम से कम 400 व्यक्ति प्रति वर्ग किमी घनत्व।
- लुई वर्थ, "अर्बनिज़्म ऐज़ ए वे ऑफ़ लाइफ़" (1938): आकार, घनत्व, विषमता। रेडफ़ील्ड: लोक–नगर सातत्य।
- समस्याएँ: मलिन बस्तियाँ, आवास, प्रदूषण, अपराध, यातायात, पानी, कचरा। योजनाएँ: स्मार्ट सिटी मिशन और अमृत (AMRUT) (2015)।
13.6 धर्मनिरपेक्षीकरण (लौकिकीकरण)
- श्रीनिवास: "धर्मनिरपेक्षीकरण का अर्थ है कि जो पहले धार्मिक माना जाता था, वह अब वैसा नहीं रहा; और इसमें विभेदीकरण की प्रक्रिया भी शामिल है..." इसके दो तत्व हैं तार्किकता और विभेदीकरण।
- कारण: आधुनिक शिक्षा, नगरीकरण, यातायात और संचार, सुधार आंदोलन, विधि व्यवस्था।
- "समाजवादी" और "पंथनिरपेक्ष" शब्द 42वें संशोधन, 1976 द्वारा प्रस्तावना में जोड़े गए। भारतीय पंथनिरपेक्षता का अर्थ है सभी धर्मों का समान सम्मान (सर्वधर्म समभाव), धर्म और राज्य का कठोर अलगाव नहीं।
13.7 वैश्वीकरण
- व्यापार, पूँजी, प्रौद्योगिकी, जनसंचार और प्रवास के माध्यम से विश्व का बढ़ता परस्पर जुड़ाव।
- एंथनी गिडेन्स: "विश्वव्यापी सामाजिक संबंधों का वह सघनीकरण जो दूर-दूर के स्थानों को इस प्रकार जोड़ता है कि स्थानीय घटनाएँ मीलों दूर घटित घटनाओं से प्रभावित होती हैं" (द कॉन्सिक्वेंसेज़ ऑफ़ मॉडर्निटी, 1990)।
- "विश्व ग्राम" (Global village) – मार्शल मैकलुहान। स्थानीय-वैश्वीकरण (Glocalisation) – रोलैंड रॉबर्टसन। "बाज़ारों का वैश्वीकरण" शब्द थियोडोर लेविट ने लोकप्रिय किया (1983)। जॉर्ज रिट्ज़र – "समाज का मैकडॉनल्डीकरण" (1993)।
- भारत: जुलाई 1991 के LPG सुधार (उदारीकरण, निजीकरण, वैश्वीकरण) (प्रधानमंत्री पी.वी. नरसिम्हा राव, वित्त मंत्री डॉ. मनमोहन सिंह)। भारत 1 जनवरी 1995 को विश्व व्यापार संगठन (WTO) का सदस्य बना।
- प्रभाव: सूचना प्रौद्योगिकी और सेवा क्षेत्र की वृद्धि, मध्यम वर्ग, उपभोक्तावाद, सांस्कृतिक समरूपीकरण, असंगठित क्षेत्र, किसानों का संकट, प्रवास, परिवार और लैंगिक भूमिकाओं में बदलाव, डिजिटल विभाजन।
इकाई 14 – सामाजिक विघटन, अपराध और बाल अपराध
14.1 सामाजिक विघटन
- डब्ल्यू.आई. थॉमस और एफ. ज़नानीकी (द पोलिश पीज़ेंट इन यूरोप एंड अमेरिका, 1918–20): "समूह के व्यक्तिगत सदस्यों पर व्यवहार के प्रचलित सामाजिक नियमों के प्रभाव में कमी।"
- इलियट एवं मैरिल (सोशल डिसऑर्गनाइज़ेशन, 1934): वह प्रक्रिया जिसमें समूह के सदस्यों के बीच के संबंध टूट जाते हैं।
- फ़ैरिस: मानवीय संबंधों के प्रतिमानों और तंत्रों में विघ्न।
- लक्षण / कारण: लोकाचारों में संघर्ष, संस्थाओं का अकार्य, एक संस्था से दूसरी संस्था को प्रकार्यों का हस्तांतरण, व्यक्तिवाद, भूमिका संघर्ष, तीव्र सामाजिक परिवर्तन, सांस्कृतिक विलम्बना (ऑगबर्न), और आदर्शशून्यता (दुर्खीम)।
- प्रकार:
- वैयक्तिक विघटन – मान्य मानदंडों से विचलन: अपराध, आत्महत्या, मद्यपान, नशाखोरी, मानसिक रोग, वेश्यावृत्ति।
- पारिवारिक विघटन – विवाह-विच्छेद, परित्याग, पृथक्करण, घरेलू हिंसा, पीढ़ियों के बीच संघर्ष। इलियट और मैरिल ने इसके रूप बताए।
- सामुदायिक विघटन – साम्प्रदायिक दंगे, मलिन बस्तियाँ, गरीबी।
- सांस्कृतिक विघटन – पुराने और नए मूल्यों में संघर्ष, सांस्कृतिक विलम्बना, संस्कृति संघर्ष।
14.2 अपराध – सिद्धांत
| सिद्धांत | विचारक | मुख्य विचार |
|---|---|---|
| शास्त्रीय | सेज़ारे बेकारिया (1764), जेरेमी बेंथम | स्वतंत्र इच्छा; दंड अपराध के अनुपात में हो |
| प्रत्यक्षवादी / जैविक | सेज़ारे लोम्ब्रोसो – ल'उओमो डेलिंक्वेंटे (1876) | "जन्मजात अपराधी"; पूर्वजता (Atavism); शारीरिक लक्षण। लोम्ब्रोसो "आधुनिक अपराधशास्त्र के जनक" हैं। |
| विभेदक साहचर्य | एडविन सदरलैंड (1939) | आपराधिक व्यवहार घनिष्ठ समूहों में अंतःक्रिया से सीखा जाता है |
| आदर्शशून्यता / तनाव | आर.के. मर्टन – "सोशल स्ट्रक्चर एंड एनोमी" (1938) | सांस्कृतिक लक्ष्यों और संस्थागत साधनों के बीच अंतर से अनुकूलन के पाँच तरीके: अनुरूपता, नवाचार (अपराध), कर्मकांडवाद, पलायनवाद (नशेड़ी), विद्रोह |
| अपराधी उप-संस्कृति | अल्बर्ट कोहेन (डेलिंक्वेंट बॉयज़, 1955) | निम्न वर्ग के लड़के प्रस्थिति की कुंठा के कारण उप-संस्कृतियाँ बनाते हैं |
| विभेदक अवसर | क्लॉवर्ड और ओहलिन (1960) | आपराधिक, संघर्षात्मक और पलायनवादी उप-संस्कृतियाँ |
| सामाजिक नियंत्रण / बंधन | ट्रैविस हिर्शी (1969) | कमज़ोर सामाजिक बंधन (लगाव, प्रतिबद्धता, संलग्नता, विश्वास) से अपराध |
| लेबलिंग (नामांकन) | हॉवर्ड बेकर (आउटसाइडर्स, 1963); एडविन लेमर्ट | विचलन समाज द्वारा लगाया गया एक लेबल है। लेमर्ट ने प्राथमिक और द्वितीयक विचलन में अंतर किया। |
| पारिस्थितिक | शॉ और मैके (शिकागो) | बाल अपराध संक्रमण क्षेत्र में केंद्रित होता है |
14.3 श्वेतवसन (सफ़ेदपोश) अपराध
- यह शब्द एडविन एच. सदरलैंड ने 1939 में गढ़ा (अमेरिकन सोशियोलॉजिकल सोसाइटी में अध्यक्षीय भाषण); पुस्तक व्हाइट कॉलर क्राइम (1949)।
- परिभाषा: "सम्मानित और उच्च सामाजिक प्रस्थिति वाले व्यक्ति द्वारा अपने व्यवसाय के दौरान किया गया अपराध।"
- उदाहरण: कर चोरी, रिश्वत, मिलावट, फ़र्ज़ी खाते, इनसाइडर ट्रेडिंग, बैंक धोखाधड़ी, लाभ के लिए चिकित्सकीय लापरवाही, कालाबाज़ारी।
- विशेषताएँ: उच्च प्रस्थिति वाले लोगों द्वारा, व्यवसाय से जुड़ा, अहिंसक, पकड़ना कठिन, दंड कम ही मिलता है, समाज को भारी आर्थिक हानि। भारतीय अध्ययन: भ्रष्टाचार पर संथानम समिति (1964), जिसके बाद केंद्रीय सतर्कता आयोग बना।
14.4 बाल अपराध
- 18 वर्ष से कम आयु का बच्चा जो अपराध करता है। किशोर न्याय (बालकों की देखरेख और संरक्षण) अधिनियम, 2015: किशोर वह है जिसकी आयु 18 वर्ष से कम है। 16–18 वर्ष के बच्चे जो जघन्य अपराध (7+ वर्ष के दंड वाले) करते हैं, उन पर किशोर न्याय बोर्ड के आकलन के बाद वयस्क की तरह मुकदमा चल सकता है।
- कारण: टूटे परिवार, गरीबी, मलिन बस्तियाँ, बुरी संगत, निगरानी का अभाव, जनसंचार का प्रभाव, विद्यालय में असफलता, नशा।
- संस्थाएँ: संप्रेक्षण गृह, विशेष गृह, बाल गृह, किशोर न्याय बोर्ड, बाल कल्याण समितियाँ, परिवीक्षा।
- रोकथाम: पारिवारिक परामर्श, विद्यालय कार्यक्रम, मनोरंजन, चाइल्डलाइन (1098) हेल्पलाइन।
इकाई 15 – सामाजिक समस्याएँ
15.1 बेरोज़गारी
- प्रकार: संरचनात्मक (पूँजी या उद्योग का अभाव), घर्षणात्मक (नौकरियों के बीच), मौसमी (कृषि), प्रच्छन्न / छिपी (आवश्यकता से अधिक श्रमिक, मुख्यतः कृषि में; सीमांत उत्पादकता शून्य), चक्रीय, प्रौद्योगिकीय, शिक्षित बेरोज़गारी, अल्प-रोज़गार।
- मापन: आवधिक श्रम बल सर्वेक्षण (PLFS), सांख्यिकी मंत्रालय के NSO द्वारा, 2017 से।
- कारण: जनसंख्या वृद्धि, धीमी औद्योगिक वृद्धि, रोज़गार से मेल न खाती शिक्षा व्यवस्था, कृषि पर निर्भरता, कौशल का अभाव।
- योजनाएँ: मनरेगा (2005/06), PMEGP (2008), स्किल इंडिया और PMKVY (2015), स्टार्ट-अप इंडिया (2016), स्टैंड-अप इंडिया (2016 – SC/ST और महिला उद्यमियों को ₹10 लाख से ₹1 करोड़ तक बैंक ऋण), प्रधानमंत्री मुद्रा योजना (2015), DAY-NRLM।
15.2 गरीबी (निर्धनता)
- निरपेक्ष गरीबी (जीवन-निर्वाह के न्यूनतम स्तर से नीचे) बनाम सापेक्ष गरीबी (समाज के अन्य लोगों की तुलना में)।
- भारत में गरीबी रेखा का पहला अनुमान दादाभाई नौरोजी ने पॉवर्टी एंड अन-ब्रिटिश रूल इन इंडिया (1901) में "धन निष्कासन (ड्रेन) सिद्धांत" के साथ दिया।
- समितियाँ: लकड़ावाला (1993); तेंदुलकर (2009) – 2011–12 में 21.9% गरीब; रंगराजन (2014) – 2011–12 में 29.5%।
- बहुआयामी गरीबी सूचकांक (नीति आयोग, ऑक्सफ़ोर्ड/UNDP पद्धति पर: स्वास्थ्य, शिक्षा, जीवन स्तर)। नीति आयोग के चर्चा पत्र (2024) के अनुसार बहुआयामी गरीबी 29.17% (2013–14) से घटकर 11.28% (2022–23) हो गई, यानी लगभग 24.82 करोड़ लोग बाहर निकले। सबसे अधिक कमी उ.प्र. में हुई, लगभग 5.94 करोड़ लोग।
- ऑस्कर लुईस – "गरीबी की संस्कृति" (फ़ाइव फ़ैमिलीज़, 1959; ला विदा, 1966)। गरीबों में भाग्यवाद और वर्तमान-केन्द्रितता जैसे मूल्य विकसित होते हैं, जो पीढ़ी-दर-पीढ़ी चलते हैं।
- "गरीबी हटाओ" 1971 का नारा था (इंदिरा गांधी)। योजनाएँ: मनरेगा, सार्वजनिक वितरण प्रणाली और राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम 2013, पीएम-किसान (2019), पीएम गरीब कल्याण अन्न योजना, प्रधानमंत्री जन धन योजना (2014)।
15.3 मद्यपान और मादक द्रव्य व्यसन
- प्रभाव: स्वास्थ्य की हानि, परिवार का टूटना, घरेलू हिंसा, गरीबी, अपराध, सड़क दुर्घटनाएँ, काम का नुकसान।
- कारण: साथियों का दबाव, तनाव, बेरोज़गारी, पारिवारिक समस्याएँ, आसानी से उपलब्धता, जिज्ञासा, जनसंचार।
- अनुच्छेद 47 (नीति निदेशक तत्व): राज्य स्वास्थ्य के लिए हानिकारक मादक पेयों और द्रव्यों के सेवन पर प्रतिबंध लगाने का प्रयास करेगा।
- कानून और कार्यक्रम: NDPS अधिनियम, 1985 (स्वापक औषधि और मनःप्रभावी पदार्थ); नशा मुक्त भारत अभियान (2020); मादक पदार्थों की माँग में कमी के लिए राष्ट्रीय कार्य योजना; नशा मुक्ति केंद्र।
- पूर्ण मद्य निषेध वाले राज्य: गुजरात, बिहार (2016 से), नागालैंड, मिज़ोरम, और केंद्रशासित प्रदेश लक्षद्वीप।
15.4 भिक्षावृत्ति
- प्रकार: सक्षम शरीर वाले भिखारी, दिव्यांग, बच्चे (अक्सर मजबूर किए गए), धार्मिक भिक्षु, और वृद्धावस्था या रोग के कारण भीख माँगने वाले।
- कारण: गरीबी, बेरोज़गारी, दिव्यांगता, परिवार का टूटना, संगठित भिक्षावृत्ति गिरोह, धार्मिक परंपरा (दान), प्रवास।
- कानून: बॉम्बे भिक्षावृत्ति निवारण अधिनियम, 1959 (कई राज्यों ने अपनाया)। 2018 में दिल्ली उच्च न्यायालय ने दिल्ली में भीख माँगने को अपराध की श्रेणी से हटाया (हर्ष मंदर बनाम भारत संघ)।
- स्माइल (SMILE) योजना (2022) – आजीविका और उद्यम के लिए हाशिए के व्यक्तियों को सहायता – भिक्षावृत्ति में लगे व्यक्तियों और ट्रांसजेंडर व्यक्तियों का पुनर्वास।
15.5 जनसंख्या की समस्याएँ
| जनगणना 2011 – भारत | आँकड़ा | उत्तर प्रदेश |
|---|---|---|
| जनसंख्या | 121.09 करोड़ | 19.98 करोड़ (सबसे अधिक जनसंख्या वाला राज्य, 16.5%) |
| दशकीय वृद्धि (2001–11) | 17.7% | 20.2% |
| घनत्व | 382 प्रति वर्ग किमी | 829 प्रति वर्ग किमी |
| लिंगानुपात | 943 | 912 |
| शिशु लिंगानुपात (0–6) | 919 | 902 |
| साक्षरता | 74.04% (पुरुष 82.14, महिला 65.46) | 67.68% |
| अनुसूचित जाति जनसंख्या | 16.6% | 20.7% (लगभग 4.14 करोड़ – सभी राज्यों में सबसे अधिक संख्या) |
| अनुसूचित जनजाति जनसंख्या | 8.6% | 0.57% |
| नगरीय जनसंख्या | 31.16% | 22.27% |
- टी.आर. माल्थस, एन एस्से ऑन द प्रिंसिपल ऑफ़ पॉपुलेशन (1798): जनसंख्या ज्यामितीय क्रम (1, 2, 4, 8...) में बढ़ती है, जबकि खाद्यान्न अंकगणितीय क्रम (1, 2, 3, 4...) में। नियंत्रण: प्राकृतिक / सकारात्मक (अकाल, रोग, युद्ध) और निवारक (देर से विवाह, नैतिक संयम)।
- जनांकिकीय संक्रमण सिद्धांत (वॉरेन थॉम्पसन 1929, फ़्रैंक नोटेस्टीन 1945): उच्च जन्म और मृत्यु दर → घटती मृत्यु दर → घटती जन्म दर → निम्न जन्म और मृत्यु दर।
- भारत ने 1952 में विश्व का पहला राष्ट्रीय परिवार नियोजन कार्यक्रम शुरू किया। राष्ट्रीय जनसंख्या नीति 2000; NFHS-5 (2019–21): कुल प्रजनन दर (TFR) 2.0 (प्रतिस्थापन स्तर 2.1 से नीचे), लिंगानुपात 1,000 पुरुषों पर 1,020 महिलाएँ। उ.प्र. की TFR लगभग 2.4। उ.प्र. जनसंख्या नीति 2021–30।
- 2023 में भारत विश्व का सबसे अधिक जनसंख्या वाला देश बना (संयुक्त राष्ट्र अनुमान)।
- समस्याएँ: बेरोज़गारी, गरीबी, संसाधनों पर दबाव, आवास, स्वास्थ्य, शिक्षा, पर्यावरण की हानि। जनसांख्यिकीय लाभांश एक अवसर है।
15.6 लैंगिक असमानता और महिलाओं की स्थिति
- लिंग बनाम जेंडर: लिंग (Sex) जैविक है; जेंडर सामाजिक या सांस्कृतिक है – एन ओकले (1972)।
- सिमोन द बोउवार, द सेकंड सेक्स (1949): "स्त्री पैदा नहीं होती, बनाई जाती है।" बेट्टी फ़्रीडन, द फ़ेमिनिन मिस्टीक (1963)। केट मिलेट, सेक्शुअल पॉलिटिक्स (1970) – पितृसत्ता।
- भारत में महिलाओं की स्थिति: वैदिक काल में अपेक्षाकृत ऊँची स्थिति (गार्गी, मैत्रेयी) उत्तर-वैदिक, स्मृति और मध्यकाल में गिर गई (बाल विवाह, सती, पर्दा, विधवा पुनर्विवाह पर रोक)। सुधारक: राजा राममोहन राय (लॉर्ड बेंटिंक के समय 1829 में सती प्रथा समाप्त), ईश्वरचन्द्र विद्यासागर (विधवा पुनर्विवाह अधिनियम 1856), ज्योतिबा और सावित्रीबाई फुले (पहला बालिका विद्यालय, पुणे, 1848), पंडिता रमाबाई, डी.के. कर्वे।
- "टूवर्ड्स इक्वैलिटी" रिपोर्ट (1974) – भारत में महिलाओं की स्थिति पर समिति (CSWI), जिसने स्वतंत्रता के बाद महिलाओं की स्थिति में गिरावट दिखाई।
- समस्याएँ: कन्या भ्रूण हत्या और घटता शिशु लिंगानुपात, दहेज, घरेलू हिंसा, यौन उत्पीड़न, कार्यबल में कम भागीदारी, दोहरा बोझ, कम राजनीतिक प्रतिनिधित्व, वेतन में लैंगिक अंतर, मानव तस्करी।
- कानून: दहेज निषेध अधिनियम 1961; PCPNDT अधिनियम 1994 (गर्भधारण पूर्व और प्रसव पूर्व निदान तकनीक अधिनियम – लिंग चयन के विरुद्ध); घरेलू हिंसा से महिलाओं का संरक्षण अधिनियम 2005; विशाखा दिशानिर्देश (1997) → POSH अधिनियम 2013 (कार्यस्थल पर महिलाओं का यौन उत्पीड़न); मातृत्व लाभ (संशोधन) अधिनियम 2017 (26 सप्ताह); निर्भया मामले के बाद आपराधिक कानून (संशोधन) अधिनियम 2013।
- नारी शक्ति वंदन अधिनियम – 106वाँ संविधान संशोधन अधिनियम, 2023: लोकसभा और राज्य विधानसभाओं में एक-तिहाई सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित। यह अगली जनगणना और परिसीमन के बाद लागू होगा।
- योजनाएँ: बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ (22 जनवरी 2015, पानीपत), सुकन्या समृद्धि योजना, उज्ज्वला (2016), मिशन शक्ति। राष्ट्रीय महिला आयोग (1992, 1990 के अधिनियम के तहत)।
15.7 अनुसूचित जातियों, अनुसूचित जनजातियों और अन्य पिछड़े वर्गों की समस्याएँ
ऐतिहासिक पृष्ठभूमि
- "अनुसूचित जाति" शब्द का आधिकारिक प्रयोग पहली बार भारत शासन अधिनियम 1935 में हुआ (साइमन कमीशन ने "दलित वर्ग / Depressed classes" शब्द प्रयोग किया था)। गांधीजी ने "हरिजन" शब्द दिया; "दलित" स्वयं चुना गया नाम है, जिसे दलित पैंथर्स (1972) ने लोकप्रिय किया।
- साम्प्रदायिक पंचाट (रैम्से मैकडोनाल्ड, 16 अगस्त 1932) ने दलित वर्गों को पृथक निर्वाचन दिया → गांधीजी ने यरवदा जेल में अनशन किया → पूना पैक्ट, 24 सितम्बर 1932, गांधीजी और आंबेडकर के बीच: पृथक निर्वाचन के स्थान पर संयुक्त निर्वाचन में आरक्षित सीटें (148)।
- डॉ. बी.आर. आंबेडकर (1891–1956): समाचार पत्र मूकनायक (1920), बहिष्कृत भारत (1927); बहिष्कृत हितकारिणी सभा (1924); महाड़ सत्याग्रह (1927, चवदार तालाब); मनुस्मृति दहन (25 दिसम्बर 1927); कालाराम मंदिर प्रवेश (नासिक, 1930); तीनों गोलमेज़ सम्मेलनों में भाग लिया; स्वतंत्र श्रमिक दल (1936); अनुसूचित जाति संघ (1942); संविधान की प्रारूप समिति के अध्यक्ष; पहले विधि मंत्री; 14 अक्टूबर 1956 को नागपुर (दीक्षाभूमि) में बौद्ध धर्म ग्रहण किया; 6 दिसम्बर 1956 को निधन (महापरिनिर्वाण दिवस); भारत रत्न 1990।
- अन्य सुधारक: ज्योतिबा फुले (सत्यशोधक समाज, 1873; गुलामगिरी, 1873), श्री नारायण गुरु (SNDP, 1903), ई.वी. रामासामी "पेरियार" (आत्मसम्मान आंदोलन, 1925), अय्यंकाली (केरल), स्वामी अछूतानन्द (उ.प्र. में आदि हिन्दू आंदोलन, 1920 का दशक), कांशीराम (BAMCEF 1978, DS-4 1981, बसपा 14 अप्रैल 1984)।
संवैधानिक संरक्षण (अत्यंत महत्वपूर्ण)
| अनुच्छेद | प्रावधान |
|---|---|
| 15(4) | SC/ST/पिछड़े वर्गों की उन्नति के लिए विशेष प्रावधान (पहला संशोधन 1951) |
| 15(5) | निजी संस्थाओं सहित शिक्षण संस्थाओं में आरक्षण (93वाँ संशोधन 2005) |
| 16(4) | पिछड़े वर्गों के लिए सरकारी नियुक्तियों में आरक्षण |
| 16(4क) | SC/ST के लिए पदोन्नति में आरक्षण (77वाँ संशोधन 1995) |
| 17 | अस्पृश्यता का अंत; इसका किसी भी रूप में आचरण अपराध है |
| 23 | बेगार (बलात् श्रम) और मानव तस्करी का निषेध |
| 46 | नीति निदेशक तत्व – SC/ST के शैक्षिक और आर्थिक हितों की अभिवृद्धि; अन्याय और शोषण से उनकी रक्षा |
| 330, 332 | लोकसभा और राज्य विधानसभाओं में SC/ST के लिए सीटों का आरक्षण |
| 334 | राजनीतिक आरक्षण की समय-सीमा – 104वें संशोधन (2019) द्वारा 2030 तक बढ़ाई गई |
| 335 | सेवाओं में SC/ST के दावे, प्रशासन की दक्षता के अनुरूप |
| 338 | राष्ट्रीय अनुसूचित जाति आयोग (NCSC) |
| 338क | राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग (89वाँ संशोधन 2003) |
| 338ख | राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग आयोग – संवैधानिक दर्जा (102वाँ संशोधन 2018) |
| 340 | पिछड़े वर्गों की जाँच के लिए आयोग की नियुक्ति |
| 341 / 342 | राष्ट्रपति हर राज्य के लिए अनुसूचित जातियों (341) / जनजातियों (342) की सूची अधिसूचित करते हैं; संसद इसमें परिवर्तन कर सकती है |
| पाँचवीं और छठी अनुसूची | अनुसूचित क्षेत्रों / असम, मेघालय, त्रिपुरा, मिज़ोरम के जनजातीय क्षेत्रों का प्रशासन |
कानून और ऐतिहासिक निर्णय
- अस्पृश्यता (अपराध) अधिनियम 1955 → नाम बदलकर नागरिक अधिकार संरक्षण अधिनियम 1976।
- अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम, 1989 – विशेष न्यायालय; 2015 और 2018 में संशोधन (2018 के संशोधन ने सुभाष काशीनाथ महाजन मामले के बाद कड़े प्रावधान बहाल किए)।
- हाथ से मैला उठाने वाले कर्मियों के नियोजन का प्रतिषेध और उनका पुनर्वास अधिनियम, 2013; वन अधिकार अधिनियम, 2006; पेसा, 1996।
- अन्य पिछड़ा वर्ग: काका कालेलकर आयोग (1953, पहला पिछड़ा वर्ग आयोग); मंडल आयोग (बी.पी. मंडल, 1979; रिपोर्ट 1980) – OBC के लिए 27% आरक्षण, 1990 में लागू (वी.पी. सिंह)। इंद्रा साहनी मामला (1992) – OBC के 27% आरक्षण को सही ठहराया, आरक्षण पर 50% की सीमा, और क्रीमी लेयर का बहिष्कार।
- आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग (EWS): 10% आरक्षण (103वाँ संशोधन, 2019), जनहित अभियान (2022) में सही ठहराया गया।
- पंजाब राज्य बनाम दविंदर सिंह (1 अगस्त 2024): 7 न्यायाधीशों की पीठ (6:1) ने राज्यों को आरक्षण के लिए अनुसूचित जातियों का उप-वर्गीकरण करने की अनुमति दी (ई.वी. चिन्नैया, 2004 को पलटते हुए)।
अनुसूचित जातियों की समस्याएँ
अस्पृश्यता और भेदभाव (कुछ क्षेत्रों में आज भी), अत्याचार और हिंसा, भूमिहीनता, गरीबी, कम शिक्षा और बीच में पढ़ाई छोड़ना, हाथ से मैला उठाना, बंधुआ मज़दूरी, ऊँचे पदों पर कम प्रतिनिधित्व, विवाह, आवास और मंदिरों में सामाजिक बहिष्कार, "क्रीमी लेयर" पर बहस, और SC महिलाओं की समस्याएँ (दोहरा भेदभाव)।
अनुसूचित जनजातियों की समस्याएँ
- भूमि का हस्तांतरण (छिन जाना), साहूकारों का कर्ज़, बाँधों, खदानों और परियोजनाओं से विस्थापन, वन अधिकारों का नुकसान, झूम (स्थानांतरित) खेती, खराब स्वास्थ्य और शिक्षा, पहचान और संस्कृति का संकट, उग्रवाद (नक्सलवाद), बिचौलियों द्वारा शोषण।
- दृष्टिकोण: पृथक्करण (वेरियर एल्विन), सात्मीकरण (जी.एस. घुरिये – "पिछड़े हिन्दू"), एकीकरण (नेहरू का जनजातीय पंचशील)।
- भारत की सबसे बड़ी जनजाति भील है, उसके बाद गोंड (जनगणना 2011)।
- उ.प्र. की अनुसूचित जनजातियाँ: थारू (तराई – लखीमपुर खीरी, बहराइच, श्रावस्ती, बलरामपुर, महराजगंज), बुक्सा, भोटिया, जौनसारी, राजी, और दक्षिण में (सोनभद्र, मिर्ज़ापुर, ललितपुर): गोंड, खरवार, सहरिया, बैगा, पंखा, परहिया, अगरिया, पतारी, चेरो, भुइयाँ।
अन्य पिछड़े वर्गों की समस्याएँ
निचले OBC का शैक्षिक और आर्थिक पिछड़ापन, OBC के भीतर आरक्षण लाभों का असमान वितरण (उप-वर्गीकरण पर रोहिणी आयोग, 2017), कृषि संकट, और ऊँची नौकरियों में प्रतिनिधित्व की कमी।
सामान्य अध्ययन – महत्वपूर्ण तथ्य (30 प्रश्न)
उत्तर प्रदेश – सामान्य ज्ञान
| तथ्य | उत्तर |
|---|---|
| नाम का इतिहास | पश्चिमोत्तर प्रांत और अवध को 1902 में मिलाकर आगरा एवं अवध संयुक्त प्रांत बना; 1937 में नाम संयुक्त प्रांत हुआ; 24 जनवरी 1950 को उत्तर प्रदेश बना (उ.प्र. दिवस) |
| राजधानी | लखनऊ (1920 के दशक में इलाहाबाद से स्थानांतरित) |
| जिले / मंडल | 75 जिले, 18 मंडल |
| सीटें | लोकसभा 80, राज्यसभा 31, विधानसभा 403, विधान परिषद 100 |
| उच्च न्यायालय | इलाहाबाद – 1866 में आगरा में स्थापित, 1869 में इलाहाबाद आया; लखनऊ खंडपीठ |
| प्रथम | पहले मुख्यमंत्री: गोविन्द बल्लभ पंत; भारत की पहली महिला मुख्यमंत्री: सुचेता कृपलानी (उ.प्र., 1963); भारत की पहली महिला राज्यपाल: सरोजिनी नायडू (उ.प्र., 1947) |
| राजकीय प्रतीक | पक्षी: सारस; पशु: बारहसिंगा; वृक्ष: अशोक; पुष्प: पलाश |
| नदियाँ | गंगा बिजनौर से उ.प्र. में प्रवेश करती है; गंगा, यमुना और (पौराणिक) सरस्वती का संगम प्रयागराज में (त्रिवेणी संगम)। अन्य नदियाँ: घाघरा, गोमती, रामगंगा, बेतवा, केन, चंबल, सोन |
| राष्ट्रीय उद्यान / अभयारण्य | दुधवा राष्ट्रीय उद्यान (लखीमपुर खीरी) – बाघ, बारहसिंगा; चन्द्रप्रभा वन्यजीव अभयारण्य (चंदौली); पीलीभीत टाइगर रिज़र्व; अमानगढ़ टाइगर रिज़र्व (बिजनौर); रानीपुर टाइगर रिज़र्व (चित्रकूट) |
| उ.प्र. में स्वतंत्रता संघर्ष | 1857 का विद्रोह मेरठ (10 मई 1857) से शुरू हुआ; नेता: रानी लक्ष्मीबाई (झाँसी), बेगम हज़रत महल (लखनऊ), नाना साहब और तात्या टोपे (कानपुर), मंगल पाण्डेय (बलिया); चौरी चौरा (गोरखपुर, 4 फ़रवरी 1922) के बाद गांधीजी ने असहयोग आंदोलन वापस लिया; काकोरी ट्रेन एक्शन (9 अगस्त 1925) – रामप्रसाद बिस्मिल, अशफ़ाक़उल्ला ख़ाँ; चन्द्रशेखर आज़ाद अल्फ्रेड पार्क, इलाहाबाद में शहीद हुए (1931) |
| बौद्ध स्थल | सारनाथ (प्रथम उपदेश; अशोक का सिंह स्तंभ – राष्ट्रीय प्रतीक), कुशीनगर (महापरिनिर्वाण), श्रावस्ती, कौशाम्बी, संकिसा |
| स्मारक | ताजमहल (आगरा, शाहजहाँ), फ़तेहपुर सीकरी और बुलंद दरवाज़ा (अकबर), बड़ा इमामबाड़ा (लखनऊ, आसफ़ुद्दौला, 1784) |
| हाल की घटनाएँ | काशी विश्वनाथ धाम कॉरिडोर (13 दिसम्बर 2021); राम मंदिर प्राण प्रतिष्ठा, अयोध्या (22 जनवरी 2024); महाकुंभ, प्रयागराज (13 जनवरी – 26 फ़रवरी 2025) |
| एक्सप्रेसवे | आगरा–लखनऊ (302 किमी, 2016); पूर्वांचल (341 किमी, नवम्बर 2021); बुंदेलखंड (296 किमी, जुलाई 2022); यमुना एक्सप्रेसवे (165 किमी); गंगा एक्सप्रेसवे (मेरठ–प्रयागराज, लगभग 594 किमी) |
| राज्य की योजनाएँ | एक जनपद एक उत्पाद (ODOP) – 24 जनवरी 2018 को शुरू; मिशन शक्ति (2020); कन्या सुमंगला योजना (2019); मुख्यमंत्री अभ्युदय योजना (निःशुल्क कोचिंग, 2021) |
| नृत्य / संस्कृति | कथक (लखनऊ घराना), चरकुला (ब्रज), रासलीला, नौटंकी, रामलीला (यूनेस्को अमूर्त धरोहर, 2008), बिरहा, कजरी (लोकगीत) |
भारतीय राजव्यवस्था
- संविधान 26 नवम्बर 1949 को अंगीकृत हुआ (संविधान दिवस) और 26 जनवरी 1950 को लागू हुआ। मूल रूप में 395 अनुच्छेद, 22 भाग और 8 अनुसूचियाँ थीं; अब 12 अनुसूचियाँ हैं।
- मौलिक अधिकार: भाग III (अनुच्छेद 12–35)। नीति निदेशक तत्व: भाग IV (अनुच्छेद 36–51)। मौलिक कर्तव्य: भाग IV-क (अनुच्छेद 51क), स्वर्ण सिंह समिति की सिफ़ारिश पर 42वें संशोधन (1976) द्वारा जोड़े गए; अब 11 हैं (11वाँ 86वें संशोधन, 2002 से जुड़ा)।
- अनुच्छेद 21क (शिक्षा का अधिकार, 6–14 वर्ष) 86वें संशोधन (2002) द्वारा जोड़ा गया; शिक्षा का अधिकार अधिनियम 2009, 1 अप्रैल 2010 से लागू।
- डॉ. आंबेडकर ने अनुच्छेद 32 (संवैधानिक उपचार) को संविधान का "हृदय और आत्मा" कहा।
- उपराष्ट्रपति राज्यसभा के पदेन सभापति होते हैं। राष्ट्रपति का चुनाव निर्वाचक मंडल करता है (अनुच्छेद 54)।
- आपातकाल: राष्ट्रीय (352), राष्ट्रपति शासन (356), वित्तीय (360)।
- पंचायती राज: भाग IX (73वाँ संशोधन); नगरपालिकाएँ: भाग IX-क (74वाँ संशोधन)।
शिक्षा (शिक्षकों के लिए महत्वपूर्ण)
- राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 (29 जुलाई 2020 को स्वीकृत; अध्यक्ष डॉ. के. कस्तूरीरंगन): 5+3+3+4 ढाँचा (आयु 3–8, 8–11, 11–14, 14–18); कम से कम कक्षा 5 तक मातृभाषा में शिक्षा; कक्षा 6 से व्यावसायिक शिक्षा; समग्र प्रगति पत्रक; 2035 तक उच्च शिक्षा में 50% सकल नामांकन अनुपात का लक्ष्य; शिक्षा पर GDP का 6% व्यय।
- आयोग: राधाकृष्णन (विश्वविद्यालय शिक्षा, 1948–49); मुदालियर (माध्यमिक शिक्षा, 1952–53); कोठारी आयोग (1964–66, "भारत के भाग्य का निर्माण उसकी कक्षाओं में हो रहा है"); राष्ट्रीय शिक्षा नीति 1968, 1986 (1992 में संशोधित)।
- योजनाएँ: समग्र शिक्षा (2018), पीएम-पोषण (पहले मध्याह्न भोजन, 1995), दीक्षा (डिजिटल मंच), पीएम श्री विद्यालय (2022), निपुण भारत (2021)।
अर्थव्यवस्था
- योजना आयोग (1950) के स्थान पर 1 जनवरी 2015 को नीति आयोग बना।
- वस्तु एवं सेवा कर (GST) 1 जुलाई 2017 से लागू हुआ (101वाँ संशोधन)।
- भारतीय रिज़र्व बैंक: 1 अप्रैल 1935 को स्थापित; 1949 में राष्ट्रीयकरण।
- बैंक राष्ट्रीयकरण: 1969 में 14 बैंक, 1980 में 6 बैंक।
- पंचवर्षीय योजनाएँ: पहली (1951–56) कृषि पर केंद्रित; दूसरी (1956–61) उद्योग पर (महालनोबिस मॉडल)। योजनाएँ बारहवीं (2012–17) के साथ समाप्त हुईं।
सामान्य विज्ञान (मूल)
| तथ्य | उत्तर |
|---|---|
| सबसे बड़ा ग्रह / सूर्य के सबसे निकट ग्रह | बृहस्पति / बुध |
| बल / ऊर्जा / शक्ति का SI मात्रक | न्यूटन / जूल / वाट |
| खाने का सोडा / साधारण नमक | NaHCO₃ / NaCl |
| विटामिन C / D की कमी | स्कर्वी / रिकेट्स (सूखा रोग) |
| सर्वदाता / सर्वग्राही रक्त समूह | O निगेटिव / AB पॉज़िटिव |
| कोशिका का शक्ति-गृह | माइटोकॉन्ड्रिया |
| ग्लोबल वार्मिंग के लिए सबसे अधिक ज़िम्मेदार गैस | कार्बन डाइऑक्साइड (CO₂) |
| प्रकाश की गति | लगभग 3 × 10⁸ मीटर/सेकंड |
| सबसे बड़ी ग्रंथि / सबसे बड़ा अंग | यकृत (लीवर) / त्वचा |
| मानव शरीर का सामान्य तापमान | 37 °C (98.6 °F) |